रायपुर (मनीष जायसवाल)। प्रदेश में स्कूल शिक्षा विभाग के शिक्षकों के लिए कोई ट्रांसफर पॉलिसी सामने नहीं आई है, लेकिन युक्तियुक्तकरण के बाद करीब 900 शिक्षकों के तबादले हो चुके हैं, ऐसी चर्चाएं हवा में तैर रही हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में और शिक्षकों के ट्रांसफर होने के कयास लगाए जा रहे हैं। दिवाली करीब है। बाजार में पटाखों की दुकानें सजने लगी हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में ट्रांसफर को लेकर अलग ही बारूद तैयार हो रही है। इस बार पटाखा किसी विपक्षी दल की तरफ से नहीं, बल्कि शिक्षकों के बीच से फूटा है। छत्तीसगढ़ सहायक शिक्षक समग्र शिक्षक फेडरेशन के संयोजक मनीष मिश्रा ने दिवाली के पहले सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए ऐसे सवाल दागे हैं, जिनका जवाब स्कूल शिक्षा विभाग के लिए आसान नहीं होगा।

प्रदेश के ज्यादातर शिक्षक संगठन अब तक ट्रांसफर के मुद्दे पर खामोश हैं। इसकी भी अपनी कई वजहें हैं। दूसरी तरफ समन्वय यानी कोऑर्डिनेशन के नाम पर जारी कुछ तबादला आदेशों और पर्दे के पीछे चल रही कवायद की चर्चाओं ने आम शिक्षकों के बीच खुसुर-फुसुर बढ़ा दी है। आरोप लग रहे हैं कि ट्रांसफर के इस खेल में कुछ खास लोगों को फायदा मिल रहा है, जबकि प्रदेश के दूरदराज इलाकों में सालों से नौकरी कर रहे शिक्षक अब भी अपने गृह जिले और संभाग में आने की बाट जोह रहे हैं।

मनीष मिश्रा ने इसी मुद्दे पर विभाग को घेरते हुए पूछा है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का सबका साथ, सबका विकास का नारा स्कूल शिक्षा में ट्रांसफर के मामले में कहां चला गया..? क्या इस सिस्टम में आम शिक्षक के लिए कोई जगह नहीं है…? उनका कहना है कि कोऑर्डिनेशन के नाम पर कुछ लोगों को ट्रांसफर का मौका मिल सकता है तो सालों से इंतजार कर रहे बाकी शिक्षकों को फेयर चांस क्यों नहीं मिलना चाहिए..? मुख्यमंत्री तक शायद यह फीडबैक नहीं पहुंचा है कि इस व्यवस्था से पुराने शिक्षकों में कितनी नाराजगी है..!

मिश्रा की मांग है कि पति-पत्नी के आधार पर ट्रांसफर को प्राथमिकता मिले। महिला शिक्षकों को भी राहत दी जाए। म्यूचुअल ट्रांसफर यानी आपसी तबादले के लिए साल भर मौका मिले और इसके लिए एक पारदर्शी पॉलिसी बनाई जाए। किसी खास की सिफारिश के बजाय हर पात्र शिक्षक को बराबरी का अवसर मिले।

मामला यहीं खत्म नहीं होता। स्कूल शिक्षा विभाग में संवर्ग के हिसाब से ट्रांसफर की अपनी सीमाएं और कार्य क्षेत्र रहे हैं। सहायक शिक्षक का तबादला एक जिले से दूसरे जिले में नहीं हो सकता। शिक्षक का एक संभाग से दूसरे संभाग में तबादला नहीं हो सकता, जबकि व्याख्याता का तबादला राज्य स्तर पर हो सकता है। यह विभाग के प्रशासनिक सिस्टम का हिस्सा रहा है..! ऐसे में बात उठती है कि प्रशासनिक तबादलों में इन सीमाओं का पालन हो रहा है..? आम शिक्षकों के लिए भी कभी ट्रांसफर पॉलिसी बनी तो क्या उसमें यही नियम लागू होंगे?

इस पूरे मामले में युक्तियुक्तकरण का एंगल भी जुड़ जाता है। अभी कुछ समय पहले ही विभाग ने स्कूलों में शिक्षकों की जरूरत का हिसाब लगाकर अतिशेष शिक्षकों को एक जगह से हटाकर दूसरी जगह भेजा था। इस प्रक्रिया में प्रदेश भर में विरोध हुआ। शिकायतें हुई और कई मामले अदालत तक पहुंचे। युक्तियुक्तकरण ने कई शिक्षकों को उनके परिवार से दूर कर दिया। आने-जाने का खर्च बढ़ा और मानसिक तनाव के साथ आर्थिक परेशानी भी झेलनी पड़ी। शिक्षकों के ये घाव अभी भरे भी नहीं थे कि प्रशासनिक तबादलों की कवायद शुरू हो गई।

शिक्षक नेताओं का कहना है कि जब युक्तियुक्तकरण में स्कूलों की जरूरत का पूरा कैलकुलेशन करके पोस्टिंग की गई थी तो फिर अब प्रशासनिक तबादलों की जरूरत क्यों पड़ रही है..? क्या उस समय का आकलन अधूरा था..? जिन स्कूलों से शिक्षकों को अतिशेष बताकर हटाया गया, वहां आज क्या हालात हैं और जिन स्कूलों में भेजा गया, वहां वास्तव में कितनी जरूरत थी..? विभाग को इस पूरे एडजस्टमेंट का हिसाब देना चाहिए।

मनीष मिश्रा ने विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी चुटकी ली है। उनका कहना है कि शिक्षकों की हाजिरी और गतिविधियों पर नजर रखने के लिए वीएसके एप के जरिए जीपीएस तक लगाया जा रहा है। शिक्षक कब स्कूल पहुंचा, कब निकला और कितनी छुट्टियां बची हैं, सबका हिसाब ऑनलाइन रखा जा रहा है। लेकिन विभाग के अपने ट्रांसफर ऑर्डर का हिसाब कौन रखेगा..? शिक्षकों की हर गतिविधि ट्रैक करने वाला विभाग अपने फैसलों का ट्रैक रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं करता..?

मंत्रालय के नाम पर कथित फर्जी आदेश तैयार होकर जिलों तक पहुंचने के मामले को भी उन्होंने गंभीर बताया है। उनका कहना है कि सरकार को बताना चाहिए कि असली और फर्जी आदेश की पहचान कैसे होगी..? कोऑर्डिनेशन के नाम पर आदेश जारी हो रहे हैं तो उनके पीछे की प्रशासनिक जरूरत और आधार भी सार्वजनिक होना चाहिए। आखिर इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता रखने में परेशानी क्या है..?

दूसरी तरफ आम शिक्षकों के बीच भी इस मुद्दे पर नाराजगी बढ़ रही है। कुछ शिक्षकों का कहना है कि पहले युक्तियुक्तकरण के नाम पर लोगों को घर-परिवार से दूर भेजा गया और अब अपने चहेते लोगों को पास लाने की कवायद चल रही है। ऐसे में अब कोर्ट जाना ही जरूरी लग रहा है। खबर है कि कुछ शिक्षक इस पूरे मामले को लेकर अधिवक्ताओं से चर्चा कर रहे हैं। जरूरत पड़ी तो तबादलों के मुद्दे पर न्यायालय में भी लड़ाई लड़ी जा सकती है..!

दिवाली के ठीक पहले मनीष मिश्रा ने सरकार के सामने सवालों की ऐसी बारूद बिछा दी है, जिसकी आवाज स्कूल शिक्षा विभाग तक पहुंचनी तय है। इस बार दिवाली मिलन के दौरान भी शिक्षकों के बीच ट्रांसफर का मुद्दा गर्म रहने वाला है। अब देखना है कि विभाग इन सवालों का जवाब देता है या फिर ट्रांसफर की आतिशबाजी के बीच आम शिक्षक एक बार फिर दूर खड़ा तमाशा देखता रह जाता है। सवाल उठना लाजिमी है। आखिर ट्रांसफर की इस व्यवस्था में राहत कुछ खास लोगों को ही मिलेगी या सबका साथ, सबका विकास की बात करने वाली सरकार आम शिक्षक को भी बराबरी का मौका देगी..?