बिलासपुर। सकरी तहसील के ग्राम हांफा की आदिवासी भूमि से जुड़ा मामला अब साधारण राजस्व अनियमितता नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक निगरानी, कानून के पालन और भू-माफिया के बढ़ते दुस्साहस का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है। सरकारी दस्तावेज साफ तौर पर दर्शाते हैं कि जिस जमीन पर कलेक्टर द्वारा तीन वर्षों तक किसी भी प्रकार के हस्तांतरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था, वही भूमि आगे बेच दी गई और तीसरे पक्ष को सौंप दी गई।

यह वही प्रकरण है, जिसमें पहले ही दिन सामने आ चुका था कि आदिवासी भूमि की बिक्री के लिए दी गई अनुमति सामान्य नहीं बल्कि सशर्त थी। शर्तों में स्पष्ट उल्लेख था कि किसी भी प्रकार के उल्लंघन की स्थिति में अनुमति स्वतः निरस्त मानी जाएगी। इसके बावजूद भूमि का भविष्य तय कर दिया गया और अब दूसरे स्तर की खरीद-फरोख्त ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

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राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार सुभाष सिंह राजपूत ने उक्त भूमि को आगे अमित तिवारी और प्रदीप पटेल सहित अन्य लोगों को बेचा। यह सीधे-सीधे कलेक्टर के आदेश का उल्लंघन है। सवाल केवल इतना नहीं है कि जमीन बेची गई, बल्कि यह है कि ऐसी रजिस्ट्रियां दर्ज कैसे हो गईं, जबकि कलेक्टर की शर्तें राजस्व अभिलेखों में स्पष्ट रूप से दर्ज थीं और सभी संबंधित कार्यालयों के संज्ञान में थीं।

सूत्रों का कहना है कि यह कोई एक रजिस्ट्री या एक सौदे तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह एक सुनियोजित पैटर्न का हिस्सा है—पहले सशर्त अनुमति हासिल करना, फिर त्वरित खरीद, उसके बाद तीसरे पक्ष को विक्रय और अंत में प्रशासनिक दबाव बनाना। यही तरीका भू-माफिया के नेटवर्क को मजबूत करता है और कानून की प्रभावशीलता को कमजोर करता है।

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मामला तब और गंभीर हो जाता है जब तहसील स्तर की स्थिति सामने आती है। बताया जाता है कि जब वर्तमान तहसीलदार ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि कलेक्टर की शर्तों के विरुद्ध कोई भी कार्य नहीं होगा, तब सुभाष सिंह राजपूत खुलेआम दबाव बनाता नजर आया। आरोप है कि वह तहसील कार्यालय में पूरे स्टाफ को हड़काते हुए यह कहता है कि “काम तो होकर रहेगा, तहसीलदार करें या न करें, बड़े अफसर से करवा लेंगे।” इस तरह का व्यवहार प्रशासनिक गरिमा और कानून व्यवस्था दोनों पर सीधा सवाल खड़ा करता है।

20 जून 2025 को संभाग आयुक्त कार्यालय, बिलासपुर संभाग से जारी पत्र यह स्पष्ट करता है कि यह मामला केवल तहसील या जिले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उच्च स्तर तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस और निर्णायक कार्रवाई न होना प्रशासनिक चुप्पी को और अधिक संदिग्ध बनाता है।

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ग्राम हांफा की यह जमीन अब केवल एक भूमि विवाद नहीं, बल्कि यह तय करने की कसौटी बन चुकी है कि जिले में कानून का शासन प्रभावी रहेगा या भू-माफिया के दबाव के आगे व्यवस्था झुकती नजर आएगी।