छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट/बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी सेवा में वरिष्ठता (Seniority) के निर्धारण को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि एक ही चयन प्रक्रिया के जरिए नियुक्त होने वाले प्रत्यक्ष भर्ती कर्मचारियों की वरिष्ठता उनके कार्यभार ग्रहण (Joining) करने के समय (सुबह या दोपहर) से तय नहीं होगी, बल्कि चयन सूची में उनकी मेरिट (प्रावीण्य क्रम) के आधार पर निर्धारित की जाएगी।

न्यायूमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने यह फैसला इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से जुड़े एक विवाद की सुनवाई के दौरान दिया। यह मामला कु. भुवनेश्वरी और संतोष कुमार श्रीवास के बीच वरिष्ठता के विवाद से संबंधित था। इन दोनों की नियुक्ति वर्ष 2014 में एक ही चयन प्रक्रिया के तहत स्टेनोग्राफर के पद पर हुई थी। नियुक्ति आदेश में कु. भुवनेश्वरी का नाम पहले और संतोष कुमार का नाम दूसरे स्थान पर था।

विवाद की जड़ विश्वविद्यालय का वह निर्णय था, जिसमें उसने 2020 में एक संशोधित वरिष्ठता सूची जारी की थी। इस सूची में संतोष कुमार श्रीवास को कु. भुवनेश्वरी से वरिष्ठ (Senior) घोषित कर दिया गया था। विश्वविद्यालय का तर्क था कि संतोष ने नियुक्ति के दिन पूर्वाह्न (Forenoon) में ज्वाइन किया था, जबकि भुवनेश्वरी ने अपराह्न (Afternoon) में कार्यभार संभाला था।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए ‘छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (सेवा की सामान्य शर्तें) नियम, 1961’ के नियम 12(1)(क) का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि नियम स्पष्ट हैं—सीधी भर्ती वाले कर्मचारियों की वरिष्ठता का आधार उनकी मेरिट होती है, न कि उनके ज्वाइन करने का समय। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि विश्वविद्यालय यह साबित करने में विफल रहा कि संतोष कुमार मेरिट सूची में भुवनेश्वरी से ऊपर थे। चूंकि विश्वविद्यालय मेरिट सूची या चयन समिति की कार्यवाही पेश नहीं कर सका, इसलिए नियुक्ति आदेश में दिए गए नामों के क्रम को ही सबसे विश्वसनीय आधार माना गया।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि वरिष्ठता केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी का एक महत्वपूर्ण ‘सिविल अधिकार’ है। यदि किसी कर्मचारी की वरिष्ठता में बदलाव किया जा रहा है, तो उसे नोटिस देना और उसका पक्ष सुनना अनिवार्य है। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन कर किया गया कोई भी बदलाव कानूनी रूप से मान्य नहीं होगा।

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने अप्रैल और जून 2020 में जारी उन संशोधित वरिष्ठता सूचियों को निरस्त कर दिया, जिनमें संतोष कुमार को वरिष्ठ बताया गया था। अदालत ने 9 जून 2023 की उस सूची को वैध माना, जिसमें भुवनेश्वरी को पुनः वरिष्ठ स्थान दिया गया था।

अदालत ने विश्वविद्यालय को कड़े निर्देश देते हुए कहा कि कु. भुवनेश्वरी को उनके कनिष्ठ कर्मचारी की पदोन्नति की तिथि से ही रजिस्ट्रार के पर्सनल असिस्टेंट पद पर पदोन्नति के लिए विचार किया जाए। यदि वे पात्र पाई जाती हैं, तो उन्हें ‘नोटेशनल’ (काल्पनिक) पदोन्नति, वरिष्ठता की निरंतरता और अन्य सभी सेवा संबंधी लाभ दिए जाएं। हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को आदेश की प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर पूरा करने की समय सीमा तय की है।