बिलासपुर।छत्तीसगढ़ के आईएएस अधिकारी आनंद मसीह के उरांव अनुसूचित जनजाति (ST) जाति प्रमाणपत्र को रद्द करने के मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट ने छानबीन समिति के आदेश को निरस्त कर दिया है।

कोर्ट ने पाया कि समिति ने पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद उन्हें गवाहों से जिरह करने और अपने बचाव में मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य पेश करने का प्रभावी अवसर नहीं दिया। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने मामला दोबारा छानबीन समिति को भेजते हुए 90 दिनों के भीतर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

तब तक निरस्त आदेश के आधार पर उनकी सेवा, वेतन और सेवानिवृत्ति से जुड़े पेंशन लाभों पर कोई प्रतिकूल कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।

आनंद मसीह वर्तमान में रायपुर में पुलिस प्राधिकरण के सचिव के पद पर पदस्थ हैं। उन्होंने छानबीन समिति के 24 फरवरी 2023 के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

समिति ने 22 जनवरी 1981 को जारी उनका उरांव अनुसूचित जनजाति का जाति प्रमाणपत्र निरस्त करते हुए नियमानुसार आगे की कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे।

याचिका के अनुसार, आनंद मसीह के दादा बलदेव प्रसाद वर्ष 1915 में तत्कालीन मध्यप्रदेश के बिलासपुर क्षेत्र में आकर बसे थे। उनके पिता ने भी यहां जमीन खरीदी थी।

जांच के बाद वर्ष 1981 में उन्हें उरांव जनजाति का प्रमाणपत्र जारी किया गया था। इसी प्रमाणपत्र के आधार पर उनका वर्ष 1991 में मध्यप्रदेश में उप कलेक्टर के पद पर चयन हुआ था।

उनके सामाजिक दर्जे को लेकर शिकायत मिलने के बाद वर्ष 2007 में छानबीन समिति ने प्रमाणपत्र निरस्त कर दिया था। इस आदेश को चुनौती दिए जाने पर हाईकोर्ट ने 24 जुलाई 2018 को जांच प्रक्रिया में गंभीर कमियां पाते हुए समिति का आदेश रद्द कर नए सिरे से जांच करने का निर्देश दिया था।

राज्य सरकार की अपील भी 29 अगस्त 2019 को खारिज कर दी गई थी। इसके बाद समिति ने जनवरी 2021 में नया नोटिस जारी कर दोबारा जांच शुरू की और 24 फरवरी 2023 को फिर से जाति प्रमाणपत्र निरस्त कर दिया।

मौजूदा याचिका की सुनवाई के दौरान आनंद मसीह की ओर से दलील दी गई कि छानबीन समिति ने हाईकोर्ट के पूर्व निर्देशों का पालन नहीं किया। उन्होंने व्यक्तिगत सुनवाई के साथ मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य पेश करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन उन्हें प्रभावी अवसर नहीं दिया गया।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि जाति प्रमाणपत्र धारक पर अपना सामाजिक दर्जा साबित करने की जिम्मेदारी है। याचिकाकर्ता ने आवश्यक पुराने दस्तावेज और तीन पीढ़ियों का वंश-विवरण प्रस्तुत नहीं किया था। हाईकोर्ट ने समिति को दोबारा जांच करने के अधिकार पर उठाई गई आपत्ति को खारिज किया, लेकिन जांच और सुनवाई की प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाईं।

कोर्ट ने कहा कि जिन गवाहों के बयानों के आधार पर जाति प्रमाणपत्र निरस्त किया गया, उनसे जिरह करने का अवसर याचिकाकर्ता को दिया जाना चाहिए था। बिना जिरह का अवसर दिए ऐसे बयानों के आधार पर प्रतिकूल निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल वर्ष 1950 से पहले के दस्तावेज पेश नहीं कर पाने को जाति के दावे को खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। समिति को उपलब्ध दस्तावेजों, स्थानीय जांच, मौखिक साक्ष्यों और अन्य प्रासंगिक पहलुओं का समग्र मूल्यांकन करना होगा।

हाईकोर्ट ने छानबीन समिति का 24 फरवरी 2023 का आदेश निरस्त करते हुए मामला नए सिरे से निर्णय के लिए वापस भेज दिया है।

समिति को जांच रिपोर्ट और सतर्कता प्रकोष्ठ की रिपोर्ट की प्रतियां याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराने, प्रतिकूल बयान देने वाले सभी गवाहों से जिरह का अवसर देने तथा मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति देने का निर्देश दिया गया है। इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद समिति को कारणयुक्त नया आदेश पारित करना होगा। कोर्ट ने प्रमाणित आदेश प्राप्त होने के 90 दिनों के भीतर पूरी प्रक्रिया समाप्त करने को कहा है।