Chhattisgarh High Court/छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला को पहले से यह जानकारी हो कि पुरुष शादीशुदा है और इसके बावजूद वह उसके साथ सहमति से संबंध बनाती है, तो ऐसे मामले में रेप, शादी का झांसा देकर संबंध बनाने या धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनता।

जस्टिस संजय एस. अग्रवाल की एकलपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा और महिला की अपील को खारिज कर दिया।

यह मामला डोंगरगढ़ क्षेत्र से जुड़ा है, जहां एक महिला ने महेश नामक व्यक्ति पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने और बाद में धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया था।

महिला का दावा था कि दोनों के बीच विवाह का एक इकरारनामा तैयार हुआ था, जिसके बाद वह उसके साथ रहने लगी और इस दौरान उनके बीच संबंध भी बने। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उसने आरोपी पर करीब 85 हजार रुपये खर्च किए, लेकिन बाद में पैसे मांगने पर उसे घर से निकाल दिया गया।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए पाया कि महिला के बयानों में कई विरोधाभास हैं। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि महिला द्वारा पहले दिए गए नोटिस और पुलिस शिकायत में विवाह की कोई निश्चित तिथि का उल्लेख नहीं था। साथ ही, यह तथ्य भी सामने आया कि महिला को पहले से पता था कि आरोपी व्यक्ति शादीशुदा है।

इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को सही ठहराया और महिला की अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में सहमति और तथ्यात्मक स्थिति का स्पष्ट होना आवश्यक है, और केवल आरोपों के आधार पर आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता।