Bilaspur High Court- भर्ती परीक्षा में फेल होने के बाद प्रक्रिया को चुनौती देना गलत, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की नियुक्तियों को दी हरी झंडी
मामला वर्ष 2022 का है, जब दुर्ग के फैमिली कोर्ट में स्टेनोग्राफर और सहायक ग्रेड-3 के कुल 14 रिक्त पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। इस भर्ती प्रक्रिया को खुशबू देवांगन, जितेंद्र कुमार सिन्हा और प्रमोद मानिकपुरी सहित अन्य ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

Bilaspur High Court/छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुर्ग फैमिली कोर्ट में हुई नियुक्तियों की वैधता पर मुहर लगाते हुए उन्हें चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि यदि भर्ती प्रक्रिया के दौरान प्रशासनिक सुविधा के लिए नियमों में कोई मामूली बदलाव किया जाता है और वह सभी उम्मीदवारों पर समान रूप से लागू होता है, तो उसे अवैध या भेदभावपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत का यह फैसला उन उम्मीदवारों के लिए एक बड़ा सबक है जो पूरी प्रक्रिया में शामिल होने और असफल होने के बाद चयन प्रक्रिया की खामियों पर सवाल उठाते हैं।
मामला वर्ष 2022 का है, जब दुर्ग के फैमिली कोर्ट में स्टेनोग्राफर और सहायक ग्रेड-3 के कुल 14 रिक्त पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। इस भर्ती प्रक्रिया को खुशबू देवांगन, जितेंद्र कुमार सिन्हा और प्रमोद मानिकपुरी सहित अन्य ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि विज्ञापन के अनुसार परीक्षा में 50 प्रश्न पूछे जाने थे, लेकिन वास्तविक परीक्षा में केवल 25 प्रश्न ही पूछे गए। इसके अलावा, उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि परीक्षा से मात्र दो दिन पहले चयन समिति का पुनर्गठन किया गया और प्रिंसिपल जज ने स्वयं को इसका अध्यक्ष नियुक्त कर लिया, जिसे उन्होंने प्रक्रियात्मक अनियमितता बताया था।
हाईकोर्ट ने 42 पन्नों के अपने विस्तृत फैसले में इन सभी दलीलों को तार्किक आधार पर खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि इस भर्ती के लिए लगभग 3775 आवेदन प्राप्त हुए थे।
इतनी बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को देखते हुए चयन समिति ने प्रशासनिक सुगमता के लिए प्रश्नों की संख्या को 50 से घटाकर 25 कर दिया था, लेकिन परीक्षा के कुल अंक 100 ही रखे गए थे।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह बदलाव किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि सभी परीक्षार्थियों के लिए समान था, इसलिए इसमें किसी भी तरह के भेदभाव या मनमानी की गुंजाइश नहीं दिखती। समिति का पुनर्गठन भी प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा था, जिससे चयन की निष्पक्षता प्रभावित नहीं हुई।
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि जो उम्मीदवार अपनी मर्जी से पूरी चयन प्रक्रिया में शामिल हुए और परिणाम आने पर असफल रहे, वे बाद में प्रक्रिया की तकनीकी खामियों को आधार बनाकर उसे चुनौती नहीं दे सकते।
कानून की भाषा में इसे ‘सिद्धांत की स्वीकृति’ (Doctrine of Acquiescence) कहा जाता है। इसके साथ ही, अदालत ने एक और बड़ी कानूनी चूक की ओर इशारा किया कि याचिकाकर्ताओं ने उन सफल उम्मीदवारों को इस मामले में पक्षकार (Party) नहीं बनाया था, जिनके अधिकार इस फैसले से सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते थे। किसी भी भर्ती को रद्द करने की मांग करते समय सफल उम्मीदवारों का पक्ष सुना जाना अनिवार्य है। इन्हीं ठोस आधारों पर हाईकोर्ट ने भर्ती को वैध मानते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।





