CG News।बिलासपुर। छत्तीसगढ़ टीचर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष संजय शर्मा ने कहा है, छत्तीसगढ़ के शिक्षकों की पूर्व सेवा अवधि शून्य करने से पूर्ण पेंशन पर संकट खड़ा हो गया है, पूर्व सेवा अवधि से पेंशन की गणना के लिए किए गए हजारों अभ्यावेदन को शासन ने अमान्य कर दिया है।

छत्तीसगढ़ में पंचायत एवं ग्रामीण विभाग व नगरीय निकाय के अंतर्गत जिला पंचायत एवं जनपद पंचायत के माध्यम से वर्ष 1998, 2005, 2006, 2007, 2008 तथा इसके बाद के वर्षों में नियुक्त होकर शिक्षा विभाग एवं आदिम जाति कल्याण विभाग के विद्यालयों में वर्षों तक सेवाएं देने वाले शिक्षकों की पूर्व सेवा अवधि की गणना नहीं किए जाने से उनके पूर्ण पेंशन लाभ पर संकट उत्पन्न हो गया है।

शिक्षकों का कहना है कि वर्षों तक नियमित रूप से शासकीय विद्यालयों में सेवा देने के बावजूद उनकी पूर्व सेवा अवधि को पेंशन निर्धारण में शून्य मान लिया गया है, जिसके कारण उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद पूर्ण पेंशन का लाभ मिलने में कठिनाई हो रही है।

शिक्षकों के अनुसार, उन्हें 1 अप्रैल 2012 से राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली NPS से जोड़ा गया था, इसके बाद 1 अप्रैल 2022 को अनेक शिक्षकों ने पुरानी पेंशन योजना OPS का विकल्प चुना, शिक्षकों ने मांग की कि पंचायत एवं जनपद पंचायत व नगरीय निकाय के माध्यम से की गई।

उनकी प्रथम नियुक्ति से लेकर संविलियन 2018 तक की सेवा अवधि को पेंशन के लिए अर्हकारी सेवा मानकर गणना की जाए, इस संबंध में शासन के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत किए गए तथा न्यायालय में भी मामला उठाया गया।

हाई काेर्ट के आदेशों के बावजूद शिक्षकों में निराशा

शिक्षकों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार, छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में पुरानी पेंशन एवं पूर्व सेवा अवधि की गणना से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर आदेश पारित हुए हैं।

शिक्षकों को उम्मीद थी कि न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप शासन उनकी पूर्व सेवा अवधि को मान्यता देने के लिए उचित नियम बनाएगा, लेकिन शिक्षकों का आरोप है कि उनके अभ्यावेदनों को दो बार अमान्य कर दिए जाने से उनकी उम्मीदों को झटका लगा है।

स्कूल शिक्षा विभाग के 9 अक्टूबर 2026 के आदेश में पूर्व सेवा अवधि को पुरानी पेंशन योजना की अर्हकारी सेवा में जोड़ने के संबंध में प्रस्तुत अभ्यावेदनों को अमान्य किए जाने का उल्लेख है, इससे संबंधित शिक्षकों में निराशा व्याप्त है और वे शासन से अपने मामले पर पुनर्विचार करने की मांग कर रहे हैं।

संजय शर्मा का कहना है, रामलाल डड़सेना एवं एक अन्य रिट अपील पर सुनवाई करते हुए डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के निर्णय अनुसार शासन को पेंशन के लिए स्पष्ट नीति बनाने को कहा है। सिंगल बेंच ने उक्त निर्णय को न तो खारिज किया है और न ही अवहेलना की है, बल्कि मौजूदा कानूनी और तथ्यात्मक मापदंडों के आलोक में इस मुद्दे पर पुनर्विचार का निर्देश दिया है।

राज्य सरकार द्वारा सिंगल बेंच के निर्देशों के अनुसार उचित रूप से विचार किया जा सकता है। आक्षेपित आदेश इस तरह के किसी भी विवाद को बंद नहीं करता है और कानून के अनुसार उचित निर्णय लेने के लिए इसे राज्य के लिए खुला छोड़ देता है।

हम उत्तरदाताओं की ओर से प्रस्तुत सबमिशन में योग्यता भी पाते हैं कि आक्षेपित आदेश न्यायिक संयम और राज्य की कार्रवाई में निष्पक्षता सुनिश्चित करने की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाता है। विद्वान एकल न्यायाधीश ने न तो नीतिगत क्षेत्र का अतिक्रमण किया है और न ही न्यायिक जिम्मेदारी का त्याग किया है, बल्कि एक वैध और संरचित निर्णय लेने की प्रक्रिया की सुविधा प्रदान की है।

2018 से सेवा गणना होने के कारण पेंशन की पात्रता प्रभावित

शिक्षकों का कहना है कि 2018 में संविलियन की तिथि से सेवा की गणना किए जाने के कारण उनकी वर्ष 1998 से लेकर संविलियन पूर्व तक 20 वर्ष की लंबी सेवा अवधि पेंशन निर्धारण में शामिल नहीं हो पा रही है, परिणामस्वरूप वर्ष 2028 तक जीरो पेंशन व 2029 से 2036 के बीच सेवानिवृत्त होने वाले अनेक शिक्षकों की गणना के अनुसार संविलियन के बाद की सेवा लगभग 11 से 18 वर्ष ही बनती है।

शिक्षकों का तर्क है कि उनकी प्रथम नियुक्ति की सेवा के आधार पर ही संविलियन किया गया है अतः पूर्व सेवा से संविलियन तक की सेवा अवधि को भी अर्हकारी सेवा में शामिल किया जाए, तो उनकी कुल सेवा अवधि बढ़ेगी और वे नियमानुसार अधिक पेंशन लाभ के पात्र हो सकेंगे, वर्तमान व्यवस्था के कारण वर्षों तक शिक्षा विभाग एवं आदिम जाति कल्याण विभाग के शासकीय विद्यालयों में सेवा देने के बाद भी उनकी वास्तविक सेवावधि का समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है।

33 वर्ष की सेवा और पूर्ण पेंशन का सवाल

शिक्षकों के अनुसार, पुरानी पेंशन व्यवस्था में निर्धारित अर्हकारी सेवा के आधार पर पेंशन का निर्धारण होता है। पूर्ण पेंशन के लिए 33 वर्ष की सेवा का उल्लेख करते हुए शिक्षकों ने मांग की है कि उनकी प्रथम नियुक्ति से लेकर संविलियन तक की सेवा अवधि की गणना की जाए, ताकि उनके पेंशन लाभ का निर्धारण वास्तविक सेवा अवधि के आधार पर हो सके। पेंशन की वास्तविक पात्रता एवं राशि संबंधित नियमों और लागू प्रावधानों के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिए।

शासन से पुनर्विचार कर न्यायोचित निर्णय लेने की मांग

छत्तीसगढ़ के शिक्षकों ने शासन से मांग की है कि पंचायत एवं ग्रामीण विभाग के अंतर्गत जिला पंचायत एवं जनपद पंचायत के माध्यम से की गई उनकी प्रथम नियुक्ति की सेवा को केवल संविलियन से पूर्व की सेवा होने के कारण शून्य न माना जाए। शिक्षा विभाग एवं आदिम जाति कल्याण विभाग के विद्यालयों में दी गई इस सेवा अवधि की प्रकृति, निरंतरता और लागू पेंशन नियमों के आधार पर परीक्षण कर उसे अर्हकारी सेवा में शामिल करने के संबंध में न्यायोचित निर्णय लिया जाए।

छत्तीसगढ़ टीचर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष संजय शर्मा का कहना है कि वर्षों तक शासकीय विद्यालयों में बच्चों को शिक्षित करने वाले कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के समय उनकी वास्तविक सेवा अवधि का लाभ मिलना चाहिए। शासन को उच्च न्यायालय के निर्देशों, पूर्व में जारी नियमों और शिक्षकों के अभ्यावेदनों पर पुनर्विचार करते हुए ऐसा समाधान निकालना चाहिए, जिससे उन्हें सम्मानजनक पेंशन का लाभ मिल सके। शिक्षकों को उम्मीद है कि राज्य सरकार उनकी मांग पर संवेदनशीलता से विचार करेगी और पूर्व सेवा अवधि की गणना के संबंध में स्पष्ट एवं न्यायसंगत निर्णय लेकर लंबे समय से चली आ रही इस समस्या का समाधान करेगी।