CG Bilaspur High Court/छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति (प्रमोशन) से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में बड़ी कानूनी व्यवस्था दी है। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी को विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की गलती या नियमों की अनदेखी कर प्रमोशन दिया गया है, तो राज्य सरकार को अपनी उस गलती को सुधारने का पूरा कानूनी अधिकार है।

CG Bilaspur High Court/कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि गलत तरीके से हासिल की गई पदोन्नति चाहे कितने भी लंबे समय तक प्रभावी रही हो, उससे संबंधित कर्मचारी को कोई भी स्थायी या कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता है। इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग के दो कर्मचारियों के डिमोशन (पदावनति) के आदेश को सही ठहराते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी है।

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CG Bilaspur High Court/यह मामला जल संसाधन विभाग के अंतर्गत मिनीमाता हसदेव बांगो परियोजना बिलासपुर से जुड़ा है। यहाँ कार्यरत कोरबा के हीरमन दास महंत और रायगढ़ के विद्याभूषण शुक्ला को अप्रैल 2023 में जीप ड्राइवर के पद से पदोन्नत कर मैकेनिक ग्रेड-2 बनाया गया था।

इन दोनों कर्मचारियों ने इस उच्च पद पर तीन वर्षों तक कार्य किया और विभाग की अंतरिम वरिष्ठता सूची में भी अपना स्थान बना लिया था। हालांकि, जून 2026 को मुख्य अभियंता ने एक आदेश जारी कर उनकी पदोन्नति को रद्द कर दिया और उन्हें पुनः उनके मूल पद यानी जीप ड्राइवर पर वापस भेज दिया। विभाग के इस अचानक लिए गए फैसले को चुनौती देते हुए कर्मचारियों ने हाईकोर्ट की शरण ली थी।

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कोर्ट में सुनवाई के दौरान कर्मचारियों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता ने दलील दी कि उन्होंने चयन प्रक्रिया को नियमानुसार पूरा किया था और इस पदोन्नति में उनकी ओर से किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी या जानकारी छिपाने की कोई भूमिका नहीं थी।

उनका तर्क था कि तीन साल तक ऊंचे पद पर काम करने के बाद बिना किसी विभागीय जांच के अचानक डिमोशन करना नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ और पूरी तरह से मनमाना फैसला है। कर्मचारियों का पक्ष था कि इतने लंबे समय तक पद पर रहने के बाद उनकी स्थिति को यथावत रखा जाना चाहिए था।

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वहीं, राज्य सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता कार्यालय के लॉ अफसरों ने दलील दी कि विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) ने पदोन्नति की सिफारिश करते समय अनिवार्य पात्रता शर्तों और नियमों की अनदेखी की थी। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई किसी विभागीय सजा या अनुशासनात्मक जांच का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक प्रशासनिक त्रुटि (Administrative Error) को सुधारने का प्रयास है।

कोर्ट को यह भी बताया गया कि अंतिम आदेश जारी करने से पहले कर्मचारियों को ‘कारण बताओ नोटिस’ देकर उनकी बात सुनी गई थी, जिसके बाद ही प्रक्रियात्मक सुधार किया गया।

CG Bilaspur High Court/हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद सरकार के रुख को वैध माना। अदालत ने अपने फैसले में साफ किया कि प्रक्रियात्मक त्रुटि को सुधारना सरकार का अधिकार है। कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि गलत पदोन्नति के आधार पर लंबे समय तक कार्य करने मात्र से कर्मचारी का उस पद पर कोई स्थायी अधिकार नहीं बन जाता। यदि नियुक्ति या पदोन्नति की नींव ही नियमों के विरुद्ध है, तो विभाग को अपनी गलती सुधारने का पूरा हक है।