बिलासपुर /छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने दिव्यांगता प्रमाण पत्र की वैधता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति के दिव्यांगता प्रमाण पत्र की असलियत या उसकी वैधता की जांच करने का अधिकार उप-संभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) के पास नहीं है।

कोर्ट ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि यह अधिकार क्षेत्र केवल सक्षम मेडिकल बोर्ड या संबंधित कानून के तहत गठित वैधानिक प्राधिकारी का है। इस बड़े फैसले से उन सरकारी कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है, जो दिव्यांग कोटे के तहत कार्यरत हैं और जिनकी नियुक्तियों को प्रशासनिक स्तर पर चुनौती दी जा रही थी।

यह पूरा मामला महासमुंद जिले के सहायक शिक्षक लखन बिहारी पटेल से जुड़ा है। लखन को वर्ष 2010 में 45.4 प्रतिशत श्रवण बाधिता (सुनने में अक्षमता) के प्रमाण पत्र के आधार पर दिव्यांग कोटे से शिक्षा कर्मी वर्ग-3 के पद पर नियुक्त किया गया था। उनकी नियुक्ति के वर्षों बाद कैलाश चंद्र पटेल नामक व्यक्ति ने उन पर फर्जीवाड़े का गंभीर आरोप लगाया।

शिकायत में दावा किया गया कि लखन बिहारी ने किसी अन्य व्यक्ति का मेडिकल परीक्षण कराकर और प्रमाण पत्र पर अपनी फोटो लगाकर धोखे से नौकरी हासिल की है। इस शिकायत पर संज्ञान लेते हुए कलेक्टर के निर्देश पर सरायपाली के एसडीएम ने जांच शुरू की और साल 2018 में हुए एक दोबारा मेडिकल टेस्ट की रिपोर्ट के आधार पर यह मान लिया कि शिक्षक दिव्यांग नहीं है। इसके साथ ही एसडीएम ने शिक्षक के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की अनुशंसा भी कर दी थी।

एसडीएम की इस कार्रवाई और आदेश को लखन बिहारी पटेल ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इससे पहले सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद एसडीएम के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि उनके पास दिव्यांगता प्रमाण पत्र की सत्यता जांचने का कोई क्षेत्राधिकार नहीं है।

सिंगल बेंच के इसी फैसले के खिलाफ शिकायतकर्ता ने रिट अपील दायर की थी, जिस पर अब डिवीजन बेंच का अंतिम फैसला आया है। अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि एसडीएम का आदेश केवल एक ‘सिफारिश’ थी और फर्जीवाड़े के मामले में ऐसी जांच आवश्यक है। हालांकि, अदालत ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया।

चीफ जस्टिस की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016’ का हवाला देते हुए कहा कि प्रमाण पत्र जारी करने, उसे सत्यापित करने या रद्द करने का पूरा अधिकार केवल सक्षम मेडिकल बोर्ड का है।

कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि एसडीएम एक राजस्व अधिकारी हैं, उनके पास न तो इस विषय पर कोई वैधानिक शक्ति है और न ही आवश्यक चिकित्सीय विशेषज्ञता। बिना अधिकार क्षेत्र के किसी व्यक्ति पर फर्जीवाड़े का आरोप लगाना और आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश करना कानूनन गलत है। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 2018 में हुई किसी मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर 2010 में जारी किए गए वैधानिक प्रमाण पत्र को स्वतः अमान्य नहीं माना जा सकता, जब तक कि इसके लिए तय वैधानिक प्रक्रिया न अपनाई जाए।