बिलासपुर …निजी स्कूलों की फीस को लेकर अभिभावकों में बढ़ती नाराजगी के बीच अब नियमों की साफ तस्वीर सामने आ रही है। सवाल सिर्फ फीस का नहीं है, बल्कि यह समझना जरूरी है कि स्कूल आखिर किन मदों में शुल्क ले सकते हैं और कहां से वसूली सीधे नियमों के खिलाफ चली जाती है।

नियमों के मुताबिक स्कूलों को सबसे पहले शैक्षणिक शुल्क यानी ट्यूशन फीस लेने का अधिकार है। यही वह मुख्य मद है, जिससे शिक्षकों के वेतन, पढ़ाई से जुड़ी सामग्री और स्कूल के रोजमर्रा के संचालन का खर्च पूरा किया जाता है। इसके अलावा कुछ अन्य नियमित शुल्क भी तय दायरे में लिए जा सकते हैं। जैसे प्रवेश शुल्क, जो केवल नए एडमिशन के समय एक बार लिया जा सकता है, और सावधि निधि यानी कॉशन मनी, जिसे वापसी योग्य रखना अनिवार्य है। पुस्तकालय, प्रयोगशाला और कम्प्यूटर या डिजिटल लर्निंग से जुड़े शुल्क भी तभी वाजिब माने जाते हैं, जब स्कूल वास्तव में ये सुविधाएं उपलब्ध करा रहा हो।

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इसके बाद आते हैं वैकल्पिक शुल्क, जिन्हें लेकर सबसे ज्यादा भ्रम और विवाद होता है। परिवहन, भोजन या अतिरिक्त गतिविधियों जैसे संगीत, खेल या तैराकी के नाम पर फीस तभी ली जा सकती है, जब छात्र इन सुविधाओं का उपयोग कर रहा हो। यानी हर छात्र पर ये शुल्क थोपना नियमों के खिलाफ है।

सबसे सख्त प्रावधान कैपिटेशन फीस को लेकर है। किसी भी नाम पर डोनेशन या चंदा लेना पूरी तरह गैरकानूनी है। इसी तरह विकास शुल्क भी सीमित दायरे में ही लिया जा सकता है और इसका इस्तेमाल सिर्फ बुनियादी ढांचे के विकास के लिए होना चाहिए, न कि मनमानी वसूली के लिए।

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पारदर्शिता को लेकर भी स्पष्ट नियम हैं। हर स्कूल को अपनी वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर यह सार्वजनिक करना जरूरी है कि वह किस मद में कितनी फीस ले रहा है। इसके अलावा सालाना फीस वृद्धि पर भी नियंत्रण रखा गया है। बिना जिला समिति की अनुमति के किसी भी मद में कुल मिलाकर 8 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि नहीं की जा सकती

यानी नियम साफ हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इनका पालन हो रहा है। अभिभावकों की शिकायतें लगातार इशारा कर रही हैं कि कई जगहों पर फीस के नाम पर तय दायरे से बाहर जाकर वसूली की जा रही है। ऐसे में अब नजर प्रशासनिक सख्ती पर है—क्या नियम सिर्फ कागजों में रहेंगे या जमीनी स्तर पर भी लागू होंगे।

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