नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की शक्तियों और कार्यप्रणाली को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत ED केवल महज ‘संदेह’ (Suspicion) के आधार पर किसी भी नागरिक या संस्था का बैंक खाता फ्रीज (Debits Block) नहीं कर सकती।

बैंक खातों पर रोक लगाने जैसी कड़ी कार्रवाई के लिए जांच एजेंसी के पास ठोस और दर्ज ‘विश्वास के कारण’ (Reasons to Believe) होना कानूनन अनिवार्य है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए ED की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया। सर्वोच्च अदालत ने माना कि PMLA की धारा 17(1A) को धारा 17(1) से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

अदालत ने कहा कि खातों को फ्रीज करना दरअसल संपत्ति की जब्ती (Seizure) का ही एक वैकल्पिक रूप है, इसलिए जब्ती के लिए लागू होने वाले उच्च कानूनी मानक फ्रीजिंग आदेशों पर भी समान रूप से लागू होंगे।

क्या था पूरा मामला?

यह पूरा कानूनी विवाद पूनम मलिक के दो बैंक खातों को ED द्वारा फ्रीज किए जाने से शुरू हुआ था। पूनम मलिक, कथित स्टर्लिंग बायोटेक बैंक धोखाधड़ी मामले के आरोपी गगन धवन से जुड़े रंजीत मलिक की पत्नी हैं।

दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में न तो पूनम मलिक का नाम और न ही उनके पति का नाम जांच एजेंसी की मुख्य FIR या ECIR में शामिल था। इसके बावजूद, ED ने उनके बैंक खातों को यह कहते हुए ब्लॉक कर दिया था कि “संदेह है कि इन खातों में मनी लॉन्ड्रिंग की राशि हो सकती है।”

निर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) ने शुरू में ED के इस कदम का समर्थन किया था, लेकिन अपीलीय अधिकरण (Appellate Tribunal) ने इस आदेश को गैर-कानूनी मानकर रद्द कर दिया था। इसके खिलाफ ED ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था।

दिल्ली हाईकोर्ट का रुख और सुप्रीम कोर्ट की मुहर

दिल्ली हाईकोर्ट ने ED की अपील खारिज करते हुए उसकी कार्रवाई को अवैध ठहराया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि उचित प्रक्रिया और वैधानिक आवश्यकताओं का पालन किए बिना पास किए गए फ्रीजिंग आदेश अदालत में टिक नहीं सकते।

हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया था कि बिना किसी कानूनी आधार या पुख्ता साक्ष्य के बैंक खातों को ब्लॉक करना संविधान के अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) के तहत किसी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों का सीधे तौर पर उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट की इस व्याख्या से पूरी तरह सहमति जताई। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही PMLA की धारा 17(1A) में “Reasons to Believe” शब्द सीधे तौर पर न लिखे हों, लेकिन जांच एजेंसी को मनमाने तरीके से केवल आशंका के आधार पर कार्रवाई करने की छूट नहीं दी जा सकती।

आम जनता और व्यवसायियों के लिए फैसले के मायने

सर्वोच्च अदालत का यह फैसला वित्तीय जांच एजेंसियों की शक्तियों के दुरुपयोग पर एक बड़ा अंकुश माना जा रहा है। इस फैसले से तय हो गया है कि:

  • संदेह और सबूत में अंतर: एजेंसी का केवल मनगढ़ंत संदेह (Subjective Suspicion) किसी का खाता बंद करने का आधार नहीं बन सकता; एजेंसी के पास लिखित में ठोस कारण मौजूद होने चाहिए।
  • प्रक्रिया का पालन जरूरी: ED को जब्ती या फ्रीज करने से पहले तय वैधानिक प्रारूप और औपचारिक रिकॉर्ड बनाना अनिवार्य होगा।
  • अनुच्छेद 300A की सुरक्षा: मनमाने ढंग से वित्तीय संपत्तियों पर रोक लगाना नागरिक के संपत्ति के अधिकारों पर हमला माना जाएगा।