Anukampa Niyukti News/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के समय जो नीति प्रभावी थी, उसी के आधार पर आश्रितों को नौकरी देने का निर्णय लिया जाएगा।

जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने अपने आदेश में कहा कि बाद में लागू की गई संशोधित नीतियों या सर्कुलर का उपयोग करके किसी आश्रित के पहले से तय कानूनी अधिकार को छीना या समाप्त नहीं किया जा सकता है। अदालत ने इस टिप्पणी के साथ ही राज्य सरकार द्वारा अनुकंपा नियुक्ति का दावा खारिज करने वाले वर्ष 2021 के आदेश को रद्द कर दिया और शासन को 90 दिनों के भीतर पुरानी नीति के अनुसार नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

यह पूरा मामला बस्तर क्षेत्र के हेड कांस्टेबल दिवंगत देवजी मंडावी के परिवार से जुड़ा है, जिनका निधन 11 मई 2016 को सेवा के दौरान हो गया था।

Anukampa Niyukti News/ उनकी मृत्यु के बाद दूसरी पत्नी रुखमणी मंडावी ने अपने नाबालिग पुत्र उमेश मंडावी के बालिग होने तक अनुकंपा नियुक्ति का दावा सुरक्षित रखने का आवेदन विभाग को दिया था। जब उमेश 2018 में बालिग हुआ, तब नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन वर्ष 2021 में विभाग ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि दिवंगत कर्मचारी की पहली पत्नी का पुत्र पहले से ही पुलिस विभाग में कांस्टेबल है। सरकार ने दलील दी कि संशोधित नियमों के तहत यदि परिवार का कोई भी सदस्य सरकारी सेवा में है, तो दूसरे सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती।

Anukampa Niyukti News/मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस एके प्रसाद की बेंच ने पाया कि कर्मचारी की मृत्यु 11 मई 2016 को हुई थी और उस समय राज्य में 14 जून 2013 की अनुकंपा नियुक्ति नीति लागू थी। इस पुरानी नीति के क्लॉज 15(8) में स्पष्ट प्रावधान था कि यदि आश्रित नाबालिग है, तो उसके बालिग होने तक दावे को सुरक्षित रखा जाएगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय ऐसी कोई शर्त नहीं थी कि परिवार का कोई अन्य सदस्य नौकरी में होने पर दूसरे को नियुक्ति नहीं मिलेगी। कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यह प्रतिबंधात्मक शर्त 29 अगस्त 2016 के संशोधन के जरिए जोड़ी गई थी, जिसे मई 2016 में उत्पन्न हुए अधिकार पर पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार कर्मचारी की मृत्यु के साथ ही सृजित हो जाता है और इसका मूल्यांकन उसी दिन की नीति के मानकों पर होना चाहिए। यदि बाद के संशोधनों को पुराने मामलों पर थोपा गया, तो नाबालिग आश्रितों को पुरानी नीतियों में मिलने वाली सुरक्षा का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। अदालत ने सरकार को आदेश दिया है कि वह उमेश मंडावी के मामले में 2013 की नीति के आधार पर विचार करे और इस प्रक्रिया में 2016 के संशोधन या 2019 के संकलित सर्कुलर में दी गई अपात्रता की शर्तों को आधार न बनाए।Anukampa Niyukti News