सूरजपुर। शिक्षक संवर्ग की लंबित मांगों और समस्याओं को लेकर छत्तीसगढ़ शिक्षक संघर्ष मोर्चा के बैनर तले मंगलवार को जिला मुख्यालय के रंगमंच मैदान में बड़ी संख्या में शिक्षक जुटे। जिले के सभी विकासखंडों से पहुंचे शिक्षकों ने धरना प्रदर्शन के दौरान सरकार की शिक्षा नीति, सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी की अनिवार्यता और शिक्षा विभाग की कार्यशैली को लेकर नाराजगी जताई। धरने के बाद शिक्षकों ने पैदल रैली निकाली और जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर मुख्यमंत्री एवं स्कूल शिक्षा मंत्री के नाम अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा।

 

किसी के हाथ में मांगों की तख्ती थी तो किसी ने सरकार की नीतियों के विरोध में अपनी बातों के तीर चलाए। मंच से उठी आवाजों में टीईटी, पदोन्नति, सेवा गणना, वेतन विसंगति, पेंशन और भर्ती-पदोन्नति नियमों में संशोधन जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठे। मोर्चा के प्रदेश संयोजक संजय शर्मा, केदार जैन और विरेन्द्र दुबे के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन में जिले के विभिन्न क्षेत्रों से शिक्षक शामिल हुए। जिला संचालक सचिन त्रिपाठी, यादवेन्द्र दुबे, भूपेश सिंह सहित बड़ी संख्या में शिक्षक धरना और रैली में शामिल रहे।

 

सूरजपुर का रंगमंच मैदान अपने आसपास की तस्वीरों के कारण भी मंगलवार को चर्चा में रहा। एक ओर मंच के ठीक बगल में भाजपा के प्रेमनगर विधायक भूलन सिंह मरावी का शासकीय निवास है तो दूसरी ओर सामने नगर पालिका परिषद सूरजपुर का कार्यालय, जिसमें कांग्रेस की सत्ता है। यह महज संयोग था। मगर इसी रंगमंच मैदान से एक बार फिर शिक्षक आंदोलन की आवाज उठी। एक ओर समर्थन की उम्मीद दिखाई दी तो दूसरी ओर कुछ बातें अनसुनी रह गई। आंदोलन के इतिहास में रंगमंच की अपनी जगह रही है। यह सियासत और धरने का पावर सेंटर रहा है और मंगलवार को एक बार फिर यह मैदान शिक्षकों की आवाज का गवाह बना।

 

मंगलवार को जिले के सभी विकासखंडों से पहुंचे शिक्षकों की बातों में सरकार के खिलाफ विरोध के तीर नजर आए। ये तीर किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, उस व्यवस्था के खिलाफ थे जिसे शिक्षक अपने भविष्य के लिए चिंता का कारण मान रहे हैं। रंगमंच से निकली यह आवाज आने वाले चुनावों तक किस तरह पहुंचती है, इसका असर समय बताएगा। फिलहाल इतना जरूर है कि शिक्षक सरकार और शिक्षा विभाग की कार्यशैली से खासे नाराज नजर आए।

 

शिक्षकों ने कहा कि पिछली सरकारों के कार्यकाल में उन्होंने साबित कर दिया है कि शिक्षक अगर आंदोलन को अपनी जिद बना ले तो व्यवस्थाएं कैसे लाचार हो जाती हैं। वर्तमान व्यवस्था के जिम्मेदार भूल रहे हैं कि शिक्षाकर्मी से शिक्षक बनने की लंबी लड़ाई में सड़क से लेकर सत्ता के गलियारों तक आंदोलन की आवाज पहुंची थी। मंगलवार का आंदोलन उसी तेवर का एक ट्रेलर मात्र है। फर्क इतना है कि इस बार निशाने पर सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी को लेकर सरकार की कार्यशैली है।

 

धरना स्थल से शिक्षकों ने शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव की ओर से एक दिन पहले की गई प्रेस वार्ता पर भी तीखी प्रतिक्रिया दी। शिक्षकों का कहना था कि स्कूल शिक्षा मंत्री अपने विभाग के कर्मचारियों के लिए अभिभावक की भूमिका में होता है। ऐसे समय में जब हजारों शिक्षक टीईटी की अनिवार्यता के चलते अपनी नौकरी को लेकर चिंतित हैं, तब उनकी चिंता दूर करने की दिशा में पहल की अपेक्षा थी। शिक्षकों के अनुसार विभाग की उपलब्धियां गिनाने से पहले उन शिक्षकों की चिंता को समझना जरूरी है, जिनकी सेवा और भविष्य इस व्यवस्था से सीधे जुड़े हैं।

 

शिक्षकों ने सरकार की पदोन्नति को लेकर कथित ‘डिवाइड एंड रूल’ की नीति पर भी नाराजगी जताई। उनका कहना था कि शिक्षक समाज को अलग-अलग वर्गो में बांटकर समस्या का समाधान नहीं हो सकता। टीईटी हजारों सेवारत शिक्षकों के रोजगार और जीवन से जुड़ा विषय है। ऐसे संवेदनशील मामले में सरकार की कार्यशैली में मानवीय संवेदना दिखाई देनी चाहिए।

 

मोर्चा संचालक सचिन त्रिपाठी, यादवेन्द्र दुबे और भूपेश सिंह ने कहा कि यदि प्राथमिक और मिडिल स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए टीईटी की पात्रता अनिवार्य है तो शिक्षा व्यवस्था का संचालन करने वाले अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के लिए भी शिक्षा से जुड़े मापदंड तय होने चाहिए। शिक्षा के मनोविज्ञान की समझ शिक्षा व्यवस्था के शीर्ष स्तर पर बैठे लोगों के लिए भी जरूरी है।

 

उन्होंने कहा कि जब शिक्षकों की योग्यता जांचने के लिए परीक्षा अनिवार्य की जा सकती है तो शिक्षा व्यवस्था का संचालन करने वालों के लिए भी शिक्षा से जुड़े विषयों की समझ का कोई मापदंड होना चाहिए। अधिकारियों के लिए भी परीक्षा होनी चाहिए। इस विषय पर एनसीईटी और केंद्र सरकार को भी मंथन करना चाहिए।

 

मोर्चा ने ज्ञापन में सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी की अनिवार्यता समाप्त कर सेवा सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग प्रमुखता से रखी। मोर्चा का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा टीईटी के लिए 31 अगस्त 2028 तक का समय दिया गया है। शिक्षकों ने पदोन्नति में भी टीईटी की अनिवार्यता समाप्त करने की मांग की है।

 

शिक्षक एलबी संवर्ग की पूर्व सेवा गणना भी प्रमुख मांगों में शामिल रही। मोर्चा ने पंचायत संवर्ग में प्रथम नियुक्ति तिथि से सेवा की गणना करते हुए पूर्ण पुरानी पेंशन सहित शिक्षा विभाग में लागू सभी सेवा लाभ देने की मांग रखी। इसके साथ ही समस्त शिक्षक संवर्ग की लंबित वेतन विसंगतियों को दूर करने के लिए केंद्रीय वेतनमान संरचना के आधार पर वेतन निर्धारण की मांग की गई।

 

मोर्चा ने 13 फरवरी 2026 को जारी छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा सेवा (शैक्षिक एवं प्रशासनिक संवर्ग) भर्ती एवं पदोन्नति नियम में आवश्यक संशोधन की मांग भी उठाई। ज्ञापन में एलबी संवर्ग के हितों को ध्यान में रखते हुए नियमों की विसंगतियां दूर करने की मांग की गई है।

 

मोर्चा संचालकों ने आचार्य चाणक्य के उस कथन का उल्लेख करते हुए सरकार को संकेत दिया कि सत्ता को जनता और कर्मचारियों की नाराजगी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षक समाज को एक बार फिर उसी रास्ते पर चलने के लिए मजबूर न किया जाए, जिस रास्ते ने अतीत में बड़े आंदोलनों को जन्म दिया है।

 

मोर्चा संचालकों के अनुसार मंगलवार को प्रदेश के 33 जिलों में तीन शिक्षक संगठनों ने मिलकर एक आवाज उठाई है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार का रवैया इसी तरह जारी रहा तो आने वाले दिनों में अपने हक के लिए इससे बड़ी लड़ाई लड़ी जाएगी। मोर्चा ने मुख्यमंत्री और स्कूल शिक्षा मंत्री से मांगों पर त्वरित निर्णय लेकर आदेश जारी करने का आग्रह किया। रंगमंच मैदान में मंगलवार को छोड़े गए तीरों की चुभन कितनी दूर तक जाती है, इसका जवाब आने वाला समय देगा।