Anukampa Niyukti/छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति किसी कर्मचारी के परिजन का मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह संबंधित सरकार द्वारा संकटग्रस्त परिवार को दी जाने वाली एक ‘रियायत’ या ‘सुविधा’ है।

जस्टिस संजय के. अग्रवाल की सिंगल बेंच ने अपने फैसले में यह भी साफ किया कि अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन पर विचार करते समय वही नियम और पॉलिसी लागू होगी, जो उस समय (निर्णय के दिन) प्रभावी है।

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यह मामला कोरिया जिले के बैकुंठपुर का है। यहाँ के एक सहायक शिक्षक अनूप कुजूर का निधन 6 दिसंबर 2007 को सेवाकाल के दौरान हो गया था। उनके निधन के लगभग 9 साल बाद, उनके पुत्र (याचिकाकर्ता) ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। विभाग ने उन्हें सहायक ग्रेड-तीन के पद पर नियुक्ति भी दे दी।

हालांकि, बाद में जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को पता चला कि याचिकाकर्ता की माँ पहले से ही सरकारी सेवा में ‘हेड मास्टर’ के पद पर कार्यरत हैं। चूंकि राज्य शासन की 29 अगस्त 2016 की नई पॉलिसी के अनुसार, यदि परिवार का कोई सदस्य सरकारी सेवा में है, तो दूसरे सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती, इसलिए डीईओ ने उनकी नियुक्ति रद्द कर दी।

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याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में डीईओ के आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि जब उनके पिता की मृत्यु (2007) हुई थी, तब 2016 वाली प्रतिबंधात्मक पॉलिसी लागू नहीं थी। उनका कहना था कि नियुक्ति के समय पिता की मृत्यु वाली तिथि के नियम लागू होने चाहिए।

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए.कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन पर जिस दिन विभाग विचार करता है, उस दिन राज्य शासन द्वारा लागू वर्तमान नियम ही प्रभावी होंगे। पुराने नियमों के आधार पर दावा नहीं किया जा सकता।

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बेंच ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति कोई स्थायी अधिकार (Vested Right) नहीं है। यह मृतक कर्मचारी के परिवार को अचानक आए वित्तीय संकट से उबारने के लिए दी जाने वाली एक प्रशासनिक सहायता है।यदि राज्य की वर्तमान पॉलिसी कहती है कि परिवार में किसी के सरकारी नौकरी में होने पर अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिलेगी, तो विभाग का निर्णय पूरी तरह वैध है।

हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के दावों को खारिज करते हुए जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट के इस फैसले से अब यह स्पष्ट हो गया है कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में देरी से आवेदन करना भारी पड़ सकता है, क्योंकि निर्णय के समय की प्रचलित पॉलिसी ही अंतिम मानी जाएगी।