दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि जो कर्मचारी नौकरी से इस्तीफा देता है या वॉलंटरी रिटायरमेंट लेता है, वह ‘पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972’ के तहत ग्रेच्युटी पाने का हकदार है, बशर्ते उसने कम से कम पांच साल की लगातार सर्विस पूरी कर ली हो।

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने यह फैसला दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (DTC) से जुड़े एक मामले में सुनाया।

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इस मामले में अपील करने वाले कर्मचारी (जो अब मर चुके हैं) ने लगभग 30 साल की सर्विस की थी और पारिवारिक कारणों से इस्तीफा दे दिया था।

सर्विस से इस्तीफा देने के बाद उन्हें ग्रेच्युटी, पेंशन और लीव इनकैशमेंट जैसे रिटायरमेंट बेनिफिट्स नहीं दिए गए थे।

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कोर्ट ने दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (DTC) को अपील करने वाले कर्मचारी के परिवार को ग्रेच्युटी देने का निर्देश दिया।

जस्टिस बिंदल ने अपने फैसले में कहा कि ‘सेंट्रल सिविल सर्विसेज़ (पेंशन) रूल्स, 1972 के रूल 26’ के अनुसार अपील करने वाले ने अपनी पिछली सर्विस को छोड़कर नौकरी से इस्तीफा दे दिया था, इसलिए पेंशन न देने के हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया गया।

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हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपील करने वाले के कानूनी वारिस ‘पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के सेक्शन 4’ के तहत ग्रेच्युटी पाने के हकदार हैं।

इस सेक्शन में कहा गया है कि, “एक कर्मचारी जिसने कम से कम पाँच साल की सर्विस की हो, वह ग्रेच्युटी पाने का हक़दार होगा, भले ही वह रिटायर हो गया हो या नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया हो।”

चूंकि रेस्पोंडेंट-DTC को पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट के तहत छूट नहीं दी गई थी, इसलिए कोर्ट ने माना कि अपील करने वाले के कानूनी वारिस उसकी दी गई सर्विस के लिए 1972 एक्ट के नियमों के अनुसार ग्रेच्युटी पाने के हक़दार हैं।