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शिक्षकों के तबादले की आहट…… और बढ़ता अविश्वास …! सोशल मीडिया में क्यों हो रही चर्चा… ?

बिलासपुर (मनीष जायसवाल) । जिस शिक्षक युक्तियुक्तकरण को सरकार ने उपलब्धि बताया था, वह आज भी कई शिक्षकों के लिए एक घाव जैसा है। यह घाव अभी भरा नहीं था कि अब व्याख्याताओं और प्राचार्यों के तबादले को लेकर सामने आ रही कथित खबरों ने पूरे शिक्षक समाज में हलचल मचा दी है। ऐसे में खास लोगों के तबादले की नई चर्चा ने स्कूल शिक्षा विभाग को एक बार फिर ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां से नया विवाद जन्म ले सकता है। युक्तियुक्तकरण से प्रभावित और सालों से तबादले का इंतजार कर रहे शिक्षकों के लिए यह जले पर नमक छिड़कने जैसा है।

मालूम हो कि वर्तमान में जनगणना के कारण तबादलों पर रोक है, लेकिन इसके बावजूद अंदरखाने में हलचल से हुई खबरों का वायरल होना कई सवाल खड़े करता है। जब प्रक्रिया पर रोक है, तो ये हलचल क्यों है ? शिक्षा कर्मी काल से अब तक शिक्षक संगठन एक सरल, स्पष्ट और सबके लिए समान तबादला नीति की मांग करते रहे हैं। उनका कहना है कि तबादला किसी का विशेष अधिकार नहीं होना चाहिए, इसमें सभी को समान अवसर मिलना चाहिए। लेकिन वर्तमान स्थिति इसके उलट दिखाई दे रही है। पहले की तरह विभाग ने न तो कोई आवेदन प्रक्रिया शुरू की है और न ही कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं, फिर भी बड़ी संख्या में तबादला आवेदन पहुंचने की बातें सामने आ रही हैं।

शिक्षक कहते है कि जब आवेदन मांगे ही नहीं गए, तो ये आए कहां से….? और किनके पास पहुंचे….? जिनका तबादला होगा, उसका विभागीय रिकॉर्ड क्या कहेगा  ?

तबादला मुख्यमंत्री के समन्वय से होता रहा है। लेकिन इसमें आपसी, प्रशासनिक और स्वैच्छिक शब्दों का प्रयोग भी चर्चा का विषय रहा है..! नियमों को किनारे रखकर पदस्थापना देने की बात नई नहीं है। कुछ एक के लिए यह तत्काल जरूरतमंदों और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए तो ठीक है। लेकिन थोक में करने का मकसद क्या है।

प्राचार्यों और व्याख्याताओं की पदस्थापना को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है। जल्द ही पदोन्नति की प्रक्रिया भी सामने है। ऐसे में तबादलों की चर्चा और सवाल खड़े करती है। अगर बिना तय नियम और प्रक्रिया के तबादले होते हैं, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पहले से ही यह धारणा बनी हुई है कि निचले स्तर से लेकर ऊपरी स्तर तक लेन-देन चलता है। ऐसे में जब गुपचुप तरीके से तबादलों की खबरें आती हैं, तो लोगों का भरोसा सिस्टम पर और कमजोर हो जाता है।

सत्ता के रणनीतिकार यह भूल जाते हैं कि सरकार को लगभग ढाई साल हो चुके हैं। स्कूल शिक्षा विभाग राज्य का सबसे बड़ा विभाग और शिक्षित वोट बैंक भी है। यहां लिए गए फैसलों का असर हजारों परिवारों पर पड़ता है। सोशल मीडिया भी ऐसे मामलों को तेजी से हवा देता है।

राजनीतिक चश्मे से देखें तो मामला और गंभीर हो जाता है। पहले भी एक राज्य के चुनावी समय के आसपास हुए तबादलों पर उंगली उठी थी। अब फिर से एक राज्य के चुनाव के बाद ऐसी खबरें आने से विपक्ष को मुद्दा मिल रहा है। अब सवाल उठ रहा है कि तबादलों का तीर अचानक तरकश से बाहर क्यों निकाला जा रहा है। सत्ता पक्ष से जुड़े लोग भले खुलकर कुछ न कहें, लेकिन अंदरखाने चर्चा जरूर चल रही है। अब यह मामला दफ्तरों से निकलकर प्रदेश की राजनीति तक पहुंच रहा है और सियासी मुद्दा बन सकता है।

तबादला शिक्षक के लिए सिर्फ स्थान बदलना नहीं, जीवन से जुड़ा फैसला होता है। दूर-दराज में सेवा दे रहे शिक्षक परिवार से दूर रहते हैं और तबादले को घर लौटने की उम्मीद मानते हैं। लेकिन जब यह सुविधा कुछ लोगों तक सीमित रहती है, तो बाकी में असंतोष बढ़ता है। ऐसे में शिक्षक खुलकर विरोध नहीं करते, लेकिन भीतर से आहत रहते हैं। यह स्थिति लंबी चली, तो काम और शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ता है।

शिक्षकों का कहना है कि समाधान जटिल नहीं है साफ नीति और समान अवसर जरूरी हैं। सरकार खुद सबका साथ, सबका विकास की बात करती है। यदि इसी भावना के साथ तबादला प्रक्रिया को पारदर्शी और समान बनाया जाए, तो न केवल विवाद खत्म होंगे, बल्कि भरोसा भी मजबूत होगा। और आम और खास के बीच का फर्क खत्म होगा।

 

Chief Editor

छत्तीसगढ़ के ऐसे पत्रकार, जिन्होने पत्रकारिता के सभी क्षेत्रों में काम किया 1984 में ग्रामीण क्षेत्र से संवाददाता के रूप में काम शुरू किया। 1986 में बिलासपुर के दैनिक लोकस्वर में उपसंपादक बन गए। 1987 से 2000 तक दिल्ली इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के राष्ट्रीय अखबार जनसत्ता में बिलासपुर संभाग के संवाददाता के रूप में सेवाएं दीं। 1991 में नवभारत बिलासपुर में उपसंपादक बने और 2003 तक सेवाएं दी। इस दौरान राजनैतिक विश्लेषण के साथ ही कई चुनावों में समीक्षा की।1991 में आकाशवाणी बिलासपुर में एनाउँसर-कम्पियर के रूप में सेवाएं दी और 2002 में दूरदर्शन के लिए स्थानीय साहित्यकारों के विशेष इंटरव्यू तैयार किए ।1996 में बीबीसी को भी समाचार के रूप में सहयोग किया। 2003 में सहारा समय रायपुर में सीनियर रिपोर्टर बने। 2005 में दैनिक हरिभूमि बिलासपुर संस्करण के स्थानीय संपादक बने। 2009 से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में बिलासपुर के स्थानीय न्यूज चैनल ग्रैण्ड के संपादक की जिम्मेदारी निभाते रहे । छत्तीसगढ़ और स्थानीय खबरों के लिए www.cgwall.com वेब पोर्टल शुरू किया। इस तरह अखबार, रेडियो , टीवी और अब वेबमीडिया में काम करते हुए मीडिया के सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है।
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