बिलासपुर…वर्षों से वेतन विसंगति दूर करने, नियमित वेतनमान, पेंशन, ग्रेच्युटी और सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने की मांग को लेकर संघर्ष कर रहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया है।

बिलासपुर प्रवास पर पहुंचीं केंद्रीय महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री सावित्री सिंह ठाकुर ने वेतन विसंगति और कर्मचारी दर्जे को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में स्पष्ट कहा कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं सरकारी कर्मचारी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उनकी नियुक्ति के समय ही नियमों और शर्तों में यह उल्लेख रहता है कि वे समाजसेवी स्वरूप में कार्य करेंगी और उन्हें सरकारी कर्मचारी का दर्जा प्राप्त नहीं है।

मंत्री का यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब देशभर में लाखों आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं मानदेय की जगह वेतनमान, पेंशन और कर्मचारी दर्जे की मांग को लेकर लगातार आंदोलनरत हैं। बयान सामने आते ही संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे कार्यकर्ताओं के संघर्ष और सम्मान पर चोट बताया है।

वेतन विसंगति पर सवाल, मंत्री ने दिया शर्तों का हवाला

पत्रकार वार्ता में केंद्रीय मंत्री से पूछा गया कि जब आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं वर्षों से वेतन विसंगति, नियमितीकरण और कर्मचारी दर्जे की मांग कर रही हैं, तब सरकार उनकी मांगों को गंभीरता से क्यों नहीं ले रही।

जवाब में सावित्री सिंह ठाकुर ने कहा कि केंद्र सरकार ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए कई सुविधाएं बढ़ाई हैं। उन्होंने मिनी आंगनबाड़ी केंद्रों के एकीकरण, सहायिकाओं के पदोन्नति प्रावधान, आयुष्मान भारत योजना के तहत पांच लाख रुपये तक स्वास्थ्य सुरक्षा, प्रसूति अवकाश तथा अन्य सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं का उल्लेख किया।

इसी दौरान उन्होंने कहा कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं की नियुक्ति के समय ही स्पष्ट रूप से उल्लेख रहता है कि वे सरकारी कर्मचारी नहीं हैं। उनका स्वरूप समाजसेवी के रूप में निर्धारित है और यह व्यवस्था शुरू से इसी आधार पर संचालित होती रही है। मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार लगातार सुविधाओं का विस्तार कर रही है तथा मानदेय सहित कई विषयों में राज्य सरकारों की भी भूमिका रहती है।

समाजसेवी हैं तो सरकारी योजनाओं का पूरा बोझ क्यों?

केंद्रीय मंत्री के बयान पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता-सहायिका संघ की जिला अध्यक्ष सुचित्रा शर्मा ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि यदि सरकार उन्हें समाजसेवी मानती है तो उनसे सामाजिक कार्य लिया जाए, लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकार की लगभग हर महत्वपूर्ण योजना का जमीनी क्रियान्वयन आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से ही कराया जाता है।

उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं को निर्धारित समय तक केंद्रों में उपस्थित रहना पड़ता है, सर्वेक्षण करने पड़ते हैं, पोषण अभियान चलाना पड़ता है, हितग्राहियों का सत्यापन करना पड़ता है और विभागीय आदेशों का पालन करना पड़ता है। काम में कमी होने पर कार्रवाई और बर्खास्तगी तक की चेतावनी दी जाती है। ऐसे में उन्हें समाजसेवी बताना वास्तविकता से परे है।

सुचित्रा शर्मा ने कहा कि मंत्री का बयान उन्हें बिल्कुल स्वीकार नहीं है और वह इसकी घोर निंदा करती हैं। उन्होंने कहा कि यदि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सरकारी कर्मचारी नहीं हैं तो फिर उनसे सरकारी योजनाओं का इतना बड़ा बोझ क्यों उठवाया जा रहा है।

चार महीने से केंद्रांश नहीं मिला, इसे सुविधा कहेंगे?

मंत्री द्वारा सुविधाओं का हवाला दिए जाने पर सुचित्रा शर्मा ने कहा कि जमीनी हकीकत इससे अलग है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को केंद्र सरकार की ओर से 4500 रुपये और राज्य सरकार की ओर से 5500 रुपये मानदेय मिलता है।

उनका आरोप है कि केंद्रांश की राशि पिछले चार महीनों से लंबित है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब हजारों कार्यकर्ताओं को समय पर भुगतान तक नहीं मिल रहा, तब केवल सुविधाओं का हवाला देकर उनकी मूल मांगों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कर्मचारी से ज्यादा काम, अधिकारों की बारी पर समाजसेवी”

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता-सहायिका संघ के प्रांतीय संयोजक देवेंद्र पटेल ने मंत्री के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं कई विभागीय कर्मचारियों से अधिक जिम्मेदारियां निभाती हैं।

उन्होंने कहा कि जब सरकार को आंकड़े जुटाने हों, सर्वेक्षण कराना हो, पोषण अभियान चलाना हो, टीकाकरण कार्यक्रम सफल बनाना हो या योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाना हो, तब आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कर्मचारी की तरह जिम्मेदारी निभाती हैं। लेकिन जब वेतन, पेंशन और कर्मचारी दर्जे की बात आती है तो उन्हें समाजसेवी बता दिया जाता है।

देवेंद्र पटेल ने कहा कि यह दोहरा रवैया स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केंद्रीय मंत्री को अपना बयान वापस लेना चाहिए और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को कर्मचारी दर्जा देने की दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए।

बयान वापस लें, जंतर-मंतर में होगा राष्ट्रीय आंदोलन

देवेंद्र पटेल ने कहा कि संगठन मंत्री के बयान को हल्के में नहीं लेगा। उन्होंने कहा कि देशभर के आंगनबाड़ी संगठनों के साथ मिलकर जल्द ही दिल्ली के जंतर-मंतर में बड़ा शक्ति प्रदर्शन किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि सरकार को आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं का मानदेय बढ़ाकर सम्मानजनक वेतनमान देना होगा, कर्मचारी दर्जा देना होगा, पेंशन और ग्रेच्युटी की व्यवस्था करनी होगी। यदि मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन और तेज किया जाएगा।

महिला अपराधों के सवाल पर दिखी झुंझलाहट

पत्रकार वार्ता के दौरान महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध और दुष्कर्म की घटनाओं का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। जब महिलाओं के खिलाफ अपराधों और बलात्कार की बढ़ती घटनाओं को लेकर सवाल पूछा गया तो केंद्रीय मंत्री ने जवाब में कांग्रेस सरकारों पर निशाना साधा।

उन्होंने कहा कि आज मोबाइल, इंटरनेट, 181 हेल्पलाइन और डिजिटल माध्यमों के कारण महिलाएं पहले की तुलना में अधिक संख्या में शिकायत दर्ज करा रही हैं। उनके अनुसार पहले भी घटनाएं होती थीं, लेकिन बड़ी संख्या में मामले सामने नहीं आ पाते थे। मंत्री ने वन स्टॉप सेंटर और अन्य सहायता व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया। हालांकि इस सवाल के जवाब के दौरान उनके स्वर में स्पष्ट झुंझलाहट और राजनीतिक प्रतिउत्तर अधिक दिखाई दिया।

एक बयान से फिर भड़का पुराना संघर्ष

बिलासपुर में दिया गया केंद्रीय मंत्री का यह बयान अब केवल एक जवाब भर नहीं रह गया है। इसने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के कर्मचारी दर्जे और वेतन विसंगति को लेकर वर्षों से चल रहे संघर्ष को फिर सुर्खियों में ला दिया है। एक तरफ केंद्र सरकार नियुक्ति शर्तों और समाजसेवी स्वरूप का हवाला दे रही है, वहीं दूसरी ओर संगठन इसे अपने अधिकार, सम्मान और अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न बता रहे हैं। जंतर-मंतर में प्रस्तावित राष्ट्रीय जुटान की घोषणा के बाद यह विवाद आने वाले दिनों में और तेज होने के संकेत दे रहा है।