बिलासपुर..सफलता की कहानियां हमेशा एक जैसी नहीं होतीं। किसी के सामने पारिवारिक जिम्मेदारियां होती हैं, किसी के लिए परिस्थितियां चुनौती बनती हैं तो कोई अपने सपनों को पूरा करने के लिए वर्षों तक लगातार मेहनत करता है। पंडित सुन्दरलाल शर्मा (मुक्त) विश्वविद्यालय के सप्तम दीक्षांत समारोह में ऐसी ही कुछ कहानियां सामने आईं, जिन्होंने स्वर्ण पदकों और पीएचडी की उपाधियों को केवल शैक्षणिक उपलब्धि नहीं, बल्कि संघर्ष, संकल्प और आत्मविश्वास की पहचान बना दिया।

इनमें सबसे खास कहानी सी.पी. अभिलाषा सिंह की रही। गर्भावस्था, मातृत्व, परिवार और व्यावसायिक जीवन की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने पढ़ाई का सिलसिला टूटने नहीं दिया। कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखा और एमएससी गणित में एक नहीं, बल्कि चार स्वर्ण पदक हासिल कर लिए। उनकी यह उपलब्धि बताती है कि जिम्मेदारियां सपनों का रास्ता रोकने के बजाय कई बार उन्हें हासिल करने का हौसला भी बन सकती हैं। अभिलाषा ने अपनी सफलता का श्रेय पति दीपक कुमार राजपूत और पूरे परिवार के सहयोग को दिया।

राजनीति विज्ञान में तस्वर्ण पदक,रेवती ने बढ़ाया मान

रेवती सिदार ने राजनीति विज्ञान विषय में तीन स्वर्ण पदक हासिल कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय विभाग के गुरुजनों को दिया। उनके अनुसार राजनीति विज्ञान केवल अकादमिक विषय नहीं, बल्कि लोकतंत्र और समाज की दिशा को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है। लगन, निरंतरता और सही मार्गदर्शन के साथ किया गया परिश्रम ही सफलता की राह खोलता है। तीन स्वर्ण पदकों के साथ उनकी उपलब्धि विश्वविद्यालय के लिए भी गौरव का विषय बनी।

संस्कृत के प्रति निष्ठा ने दिलाया स्वर्णिम सम्मान

ज्योति राजपूत ने एमए संस्कृत में स्वर्ण पदक हासिल कर अपनी उपलब्धि में एक और गौरवपूर्ण अध्याय जोड़ा। उन्होंने सफलता का श्रेय गुरुजनों के मार्गदर्शन, माता-पिता के आशीर्वाद और संस्कृत भाषा के प्रति अपनी निष्ठा को दिया। उनका मानना है कि संस्कृत महज एक भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और जीवन मूल्यों का समृद्ध भंडार है। उनकी उपलब्धि भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति युवाओं की रुचि और समर्पण को भी सामने लाती है।

 समस्याओं के समाधान से जोड़ने का संकल्प

गौरव चंद्रवंशी ने शिक्षा को केवल व्यक्तिगत विकास तक सीमित मानने के बजाय सामाजिक उत्थान का आधार बताया। उनका मानना है कि किसी व्यक्ति की शिक्षा में समाज के संसाधनों और योगदान की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए शिक्षित होने का उद्देश्य सामाजिक समस्याओं के समाधान में योगदान देना होना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय चुनौतियों का उल्लेख करते हुए शिक्षा के विस्तार को सामूहिक जिम्मेदारी बताया। उनकी सोच शिक्षा को व्यक्तिगत उपलब्धि से आगे समाज के प्रति दायित्व से जोड़ती है।

 शोध की सफलता और माता-पिता का सपना साकार

पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने वाली डॉ. अल्पना शर्मा की यात्रा भी प्रेरणा देने वाली है। प्रबंधन विषय में शोध के लिए उन्होंने चार वर्षों तक कठिन परिश्रम, धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ अपना सफर जारी रखा। कॉर्पोरेट जगत से शिक्षण और शोध के क्षेत्र तक पहुंचना उनके जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। आज ओ.पी. जिंदल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। उनकी यह उपलब्धि केवल शोध की उपाधि तक सीमित नहीं, बल्कि माता-पिता के सपनों को साकार करने और निरंतर आगे बढ़ने की कहानी भी है।

उपाधियों से आगे बढ़कर प्रेरणा बनीं

दीक्षांत समारोह में स्वर्ण पदक और शोध उपाधियां हासिल करने वाले विद्यार्थियों की ये कहानियां बताती हैं कि सफलता का कोई एक रास्ता नहीं होता। किसी के लिए परिवार का सहयोग ताकत बनता है, किसी के लिए गुरुजनों का मार्गदर्शन और किसी के लिए वर्षों का अनुशासन तथा संघर्ष। अभिलाषा सिंह की मातृत्व के बीच उपलब्धि, रेवती सिदार और ज्योति राजपूत की शैक्षणिक निष्ठा तथा डॉ. अल्पना शर्मा की शोध यात्रा ने इस दीक्षांत समारोह को यादगार बनाया। इन सभी की उपलब्धियां एक बात रेखांकित करती हैं- परिस्थितियां कैसी भी हों, संकल्प मजबूत हो तो सपनों को उपलब्धियों में बदला जा सकता है।