शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने और बाद में शादी से इनकार करने के आरोप में बरी किए गए 67 वर्षीय हिमांशु झा को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से राहत मिली है।

निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली पीड़िता की अपील हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने प्रारंभिक सुनवाई में ही खारिज कर दी। जस्टिस एनके व्यास और जस्टिस सुधीर कुमार की बेंच ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य इस बात की पुष्टि नहीं करते कि शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा कर महिला की सहमति प्राप्त की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी का हर अधूरा वादा अपने आप में दुष्कर्म का अपराध नहीं बनता।

मामले में जगदलपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 4 दिसंबर 2025 को हिमांशु झा को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एन), 323 और 506(2) के आरोपों से बरी कर दिया था। पीड़िता ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

गुंजन संगीत समूह से जुड़ने के दौरान हुई थी पहचान

अभियोजन के अनुसार, पीड़िता का पहले भिलाई निवासी सचिन महाजन से विवाह हुआ था। उसके एक बेटा और एक बेटी हैं। वैवाहिक विवाद के चलते वह अपने पति से अलग रहने लगी थी। जून 2021 में जगदलपुर के गुंजन संगीत समूह से जुड़ने के दौरान उसकी पहचान हिमांशु झा से हुई।

आरोप था कि हिमांशु ने अपनी पत्नी की मृत्यु हो जाने की बात कहकर पीड़िता के सामने शादी का प्रस्ताव रखा और परिवार की सहमति लेने का भरोसा दिया। इसके बाद वह उसे किराये के मकान में ले गया।

पीड़िता ने लगाए थे जबरदस्ती और धमकी देने के आरोप

पीड़िता का आरोप था कि 10 अगस्त 2021 को हिमांशु ने शादी का भरोसा देकर उसके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद 11 अप्रैल 2024 तक कई बार ऐसा किया गया। दिसंबर 2023 में उसने पुलिस में शिकायत भी की थी, लेकिन हिमांशु के शादी करने का भरोसा देने पर उस समय रिपोर्ट दर्ज कराने पर जोर नहीं दिया। बाद में उसे पता चला कि हिमांशु की पत्नी जीवित है।

पीड़िता के अनुसार, शादी की मांग करने पर उसके साथ मारपीट की गई और जान से मारने की धमकी भी दी गई। इसके बाद 1 मई 2024 को शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई।

अपील में पीड़िता ने उठाए थे ये सवाल

हाईकोर्ट में पीड़िता की ओर से तर्क दिया गया कि निचली अदालत ने उसके बयान पर उचित भरोसा नहीं किया। यह भी कहा गया कि शादी का झूठा भरोसा देकर शारीरिक संबंध बनाने के मामले में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114-ए के तहत लागू होने वाली कानूनी धारणा पर विचार नहीं किया गया। अपील में निचली अदालत के फैसले को गलत बताते हुए उसे निरस्त करने की मांग की गई थी।

बयानों और मेडिकल रिपोर्ट का हाईकोर्ट ने किया परीक्षण

डिवीजन बेंच ने पीड़िता और उसके बेटे के बयानों का उल्लेख करते हुए पाया कि दोनों अगस्त 2021 से अप्रैल 2024 तक करीब दो से तीन साल साथ रहे थे। पीड़िता ने स्वीकार किया था कि उसे हिमांशु के परिवार के बारे में जानकारी थी और इसके बाद ही उसने उसके साथ रहने की सहमति दी थी।

कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि पीड़िता का अपने पहले पति से तलाक नहीं हुआ था, हालांकि दोनों अलग रह रहे थे।

हाईकोर्ट ने पीड़िता के इस बयान पर भी ध्यान दिया कि पहली बार शारीरिक संबंध बनने के दौरान जबरदस्ती नहीं हुई थी। चिकित्सकीय परीक्षण में भी जबरन शारीरिक संबंध के कोई निशान नहीं मिले। इन परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद कोर्ट ने माना कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा कर महिला की सहमति हासिल की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के नैम अहमद और जसपाल सिंह कौरल से जुड़े फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि शादी का झूठा वादा करना और बाद में किसी कारण से वादा पूरा नहीं कर पाना अलग-अलग परिस्थितियां हैं। दुष्कर्म का अपराध तब बनता है, जब यह साबित हो कि आरोपी का शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं था और उसने केवल शारीरिक संबंध बनाने के उद्देश्य से झूठा वादा किया था। साथ ही यह भी जरूरी है कि ऐसे झूठे वादे का महिला की सहमति पर सीधा प्रभाव पड़ा हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में उपलब्ध साक्ष्य से यह साबित नहीं होता कि हिमांशु झा ने शुरुआत से ही शादी का झूठा भरोसा देकर पीड़िता की सहमति प्राप्त की थी। निचली अदालत का फैसला न तो विकृत है और न ही अवैध।