बिलासपुर/तखतपुर…(दिलीप तोलानी)..बिजली की आपूर्ति बाधित होने पर उसे बहाल करने के लिए कर्मचारी खंभों पर चढ़ते हैं, तारों के बीच काम करते हैं और हर दिन अपनी जान जोखिम में डालते हैं। लेकिन उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? यह सवाल इसलिए गंभीर हो गया है, क्योंकि दो दिन के भीतर बिजली विभाग से जुड़े दो कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। कुरेली में ढनढन निवासी अमन साहू की मौत का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि तखतपुर क्षेत्र के जरौंधा में बिजली खंभे पर सुधार कार्य के दौरान मिट्ठू नवागांव, कोटा निवासी श्रीराम पाव की जान चली गई। दो परिवारों के घरों के चिराग बुझ गए, लेकिन इस बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बिजली कर्मियों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार व्यवस्था कब जागेगी?

दो मौतें, सुरक्षा इंतजामों पर जवाब कौन देगा?

लगातार सामने आ रहे हादसे बिजली विभाग में काम करने वाले संविदा और प्लेसमेंट कर्मचारियों की कार्य परिस्थितियों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। बिजली सुधार का काम जोखिम भरा है। खंभे पर चढ़ने से लेकर विद्युत लाइन के आसपास काम करने तक हर कदम पर सुरक्षा मानकों का पालन जरूरी है। इसके लिए पर्याप्त सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षित कर्मचारी, बिजली आपूर्ति बंद होने की पुष्टि और काम के दौरान निगरानी जैसे इंतजाम अनिवार्य होने चाहिए। ऐसे में यह जांचना जरूरी है कि जरौंधा में हुए हादसे के दौरान सुरक्षा के निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन हुआ था या नहीं? यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई तो उसकी जवाबदेही किसकी तय होगी?

कुरेली की घटना के बाद जरौंधा में हुई दूसरी मौत ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। किसी हादसे के बाद जांच और मुआवजे की घोषणा अपनी जगह है, लेकिन उससे किसी परिवार का उजड़ा संसार वापस नहीं लौट सकता। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें कर्मचारी को काम पर भेजने से पहले उसकी सुरक्षा सुनिश्चित हो, न कि हादसे के बाद जिम्मेदारी तय करने की औपचारिकता निभाई जाए।

ठेकेदार के नाम विभागीय ?

बिजली विभाग में बड़ी संख्या में कर्मचारी संविदा और प्लेसमेंट व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं। विभागीय कामकाज में उनकी भूमिका किसी नियमित कर्मचारी से कम नहीं है। बिजली गुल होने पर लाइन सुधारने से लेकर आपात परिस्थितियों में व्यवस्था बहाल करने तक उन्हें ही मैदान में उतरना पड़ता है। लेकिन जब उनकी सुरक्षा, सुविधाओं और भविष्य की बात आती है तो उन्हें ठेकेदार या एजेंसी का कर्मचारी बताकर जिम्मेदारी दूसरे पर डालने का सवाल उठता है।

आखिर जिस बिजली व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए इन कर्मचारियों की सेवाएं ली जा रही हैं, उनकी जान की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं है? कर्मचारी किसी एजेंसी के माध्यम से नियुक्त हो या संविदा पर, उसकी जिंदगी और सुरक्षा का महत्व कम नहीं हो जाता। प्रशासन और बिजली विभाग को इस व्यवस्था में जवाबदेही की स्पष्ट सीमा तय करनी होगी।

 नौ साल से नियमितीकरण का इंतजार

कर्मचारियों की परेशानी केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। नियमित भर्ती के अभाव में संविदा और प्लेसमेंट व्यवस्था पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। बताया जा रहा है कि तीन वर्ष की संविदा भर्ती के नाम पर नियुक्त किए गए कर्मचारियों को नौ वर्ष बीत जाने के बाद भी नियमितीकरण का इंतजार है। वर्षों से सेवा दे रहे इन कर्मचारियों के सामने भविष्य की अनिश्चितता बनी हुई है।

नियमित होने की उम्मीद में नौकरी शुरू करने वाले कई युवा अब उम्र के ऐसे पड़ाव पर पहुंच रहे हैं, जहां उनके सामने दूसरे रोजगार के अवसर भी सीमित होते जा रहे हैं। बताया जाता है कि नियुक्ति के समय कर्मचारियों की जितनी संख्या थी, वह भी अब आधी से कम रह गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि वर्षों तक विभाग की जिम्मेदारी निभाने वाले कर्मचारियों के भविष्य को लेकर आखिर कोई ठोस निर्णय क्यों नहीं हो रहा?

 व्यवस्था संभालने वालों की जिंदगी असुरक्षित

प्रदेश में बिजली की दरों को लेकर उपभोक्ताओं की शिकायतें और नाराजगी पहले से सामने आती रही हैं। दूसरी ओर, इसी बिजली व्यवस्था को चलाने वाले कर्मचारी असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। उपभोक्ता महंगी बिजली का भुगतान कर रहे हैं और कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर आपूर्ति बनाए रखने में जुटे हैं। ऐसे में विभागीय व्यवस्था के प्रति जवाबदेही का सवाल स्वाभाविक है।

कुरेली और जरौंधा की घटनाओं को अलग-अलग हादसे मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रशासन और बिजली विभाग को दोनों मामलों की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। कार्यस्थल पर सुरक्षा इंतजामों की समीक्षा, जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों की जवाबदेही तथा सभी संविदा-प्लेसमेंट कर्मचारियों के लिए अनिवार्य सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही वर्षों से सेवा दे रहे कर्मचारियों के नियमितीकरण और भविष्य को लेकर भी स्पष्ट निर्णय सामने आना चाहिए।

आखिर कब तक जान देकर चुकाते रहेंगे?

यह सवाल अब केवल विभाग के कर्मचारियों का नहीं, बल्कि उन परिवारों का भी है जिनकी आजीविका इन्हीं कर्मचारियों की नौकरी पर निर्भर है। दो मौतों के बाद भी यदि व्यवस्था नहीं बदली तो अगला हादसा किस घर को उजाड़ेगा, इसकी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।