मध्य प्रदेश में कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मध्य प्रदेश शिक्षक संघ ने इस नियम के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए इसे उन शिक्षकों के लिए अन्यायपूर्ण करार दिया है, जिनकी नियुक्ति साल 2010 से पहले हुई थी।

संघ का तर्क है कि दशकों से सेवा दे रहे अनुभवी शिक्षकों पर बाद में बने नियमों को थोपना न केवल व्यवहारिक रूप से गलत है, बल्कि यह कानूनी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन है। इस मुद्दे को लेकर शिक्षक संघ ने अब सीधे केंद्र सरकार का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है।

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शिक्षक संघ के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. क्षत्रवीर सिंह राठौर और प्रदेश महामंत्री राकेश गुप्ता के अनुसार, 29 मई को सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के बाद देशभर के लाखों शिक्षकों में अपनी नौकरी और भविष्य को लेकर भारी असमंजस पैदा हो गया है। इस फैसले के तहत प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के सभी शिक्षकों के लिए टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य माना गया है। इसके विरोध में आगामी 18 जून को प्रदेश के सभी जिलों में कलेक्टर के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नाम ज्ञापन सौंपा जाएगा। संघ की मांग है कि केंद्र सरकार आगामी मानसून सत्र में आवश्यक विधायी संशोधन कर साल 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों की सेवाओं को सुरक्षित करे।

इस विवाद की जड़ 23 अगस्त 2010 को एनसीटीई (NCTE) द्वारा जारी वह अधिसूचना है, जिसमें टीईटी को न्यूनतम योग्यता घोषित किया गया था। संघ का कहना है कि जो शिक्षक पिछले 15 से 20 सालों से शिक्षा और राष्ट्र निर्माण में जुटे हैं, उनकी नियुक्ति उस समय के प्रचलित नियमों के आधार पर हुई थी। ऐसे में अब नए मानदंडों को पूर्व प्रभाव से लागू करना उनके करियर के साथ खिलवाड़ होगा। यह मुद्दा केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है; संघ के दावों के मुताबिक, इससे प्रदेश के करीब डेढ़ लाख और देशभर के लगभग 20 लाख शिक्षकों का भविष्य सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है।

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शिक्षकों का आक्रोश सड़कों पर भी दिखाई देने लगा है। हाल ही में भोपाल के भेल स्थित दशहरा मैदान में ‘मुख्यमंत्री अनुरोध यात्रा’ के तहत एक विशाल शक्ति प्रदर्शन किया गया, जिसमें प्रदेशभर से लगभग 50 हजार शिक्षकों ने हिस्सा लिया। आजाद अध्यापक संघ के अध्यक्ष भारत पटेल ने इस दौरान चेतावनी दी कि यदि सरकार ने उनकी जायज मांगों पर जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो जून के अंत तक एक और बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा। 

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