बिलासपुर/सक्ति: अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान—जो जरूरतमंद परिवारों को सहारा देने के लिए बना—बिलासपुर और सक्ती के शिक्षा विभाग में अब एक संगठित खेल के रूप में सामने आ रहा है। आरोप साफ हैं और सीधे हैं: नियमों को दरकिनार कर नियुक्तियां दी गईं और जब मामला उठा तो उसी सिस्टम ने जांच को भी अपने नियंत्रण में रख लिया।

इस पूरे विवाद का केंद्र सौम्या जोहोआस का मामला है। दस्तावेज बताते हैं कि यह प्रकरण शुरू से ही नियमों के दायरे में नहीं आता था। माँ की मृत्यु के समय पिता शासकीय सेवा में थे, इसलिए उस आधार पर नियुक्ति नहीं मिल सकती थी। बाद में पिता की मृत्यु हुई, लेकिन तब तक सौम्या विवाहित हो चुकी थीं—जबकि शासन के स्पष्ट निर्देश विवाहित पुत्री को अनुकंपा नियुक्ति से बाहर रखते हैं। समय सीमा भी इस मामले के खिलाफ थी—तीन साल से अधिक और पाँच साल से पुराने प्रकरणों पर विचार नहीं किया जाता।

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इसके बावजूद फाइल ने रास्ता बनाया। पुराने निरस्तीकरण के तथ्य गायब हुए, पात्रता से जुड़े बिंदु दबा दिए गए और एक नया प्रस्ताव तैयार कर रायपुर भेजा गया। वहां से नियुक्ति का आदेश जारी हो गया। यहीं से सवाल खड़ा होता है—क्या यह सिर्फ गलती थी, या नियमों को जानबूझकर मोड़कर फाइल तैयार की गई?

इस पूरे मामले को कांग्रेस नेता अंकित गौराहा ने उठाया। उन्होंने कलेक्टर से लेकर कमिश्नर, जॉइंट डायरेक्टर, सचिव और डीपीआई तक शिकायतें दर्ज कराईं और प्रमाण भी सौंपे। एक महीना बीत जाने के बाद भी विभाग ने कारवाई नहीं की है। यह चुप्पी अब खुद एक गंभीर सवाल बन गई है।

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जांच के नाम पर जो हुआ, वह भी संदेह को और गहरा करता है। एक-दो नहीं, बल्कि एक दर्जन से अधिक जांच समितियां गठित की गईं, लेकिन हर बार नतीजा शून्य रहा। जांच का दायरा सीमित किया गया और अंत में क्लीन चिट देकर मामला दबा दिया गया। आरोप है कि कई जांचें फील्ड में नहीं, बल्कि टेबल पर बैठकर पूरी कर दी गईं।

अब बात सीधे अधिकारियों की भूमिका पर आकर टिकती है। जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे का नाम लगातार सामने आ रहा है—सिर्फ अनुकंपा नियुक्ति ही नहीं, बल्कि स्कूलों की मान्यता से जुड़े प्रकरणों में भी उनकी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि हर बार जांच का परिणाम उनके अनुकूल ही आया।

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इस संदर्भ में एक गंभीर आरोप सामने आ रहा है—डीपीआई में पदस्थ उप संचालक ए.के. बंजारा को लेकर विभाग के भीतर ही यह कहा जा रहा है कि विजय टांडे पर उनका “विशेष आशीर्वाद” है। यही वजह बताई जा रही है कि जितनी भी जांचें हुईं, उनका निष्कर्ष टांडे के पक्ष में ही जाता रहा। इस आरोप ने पूरे प्रकरण को और संवेदनशील बना दिया है, क्योंकि इससे सीधे-सीधे यह संकेत मिलता है कि जांच की दिशा और निष्कर्ष प्रभावित किए जा रहे हैं।

जॉइंट डायरेक्टर स्तर पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप हैं कि बिलासपुर के जॉइंट डायरेक्टर आदित्य तिवारी ने इस पूरे मामले में प्रभावी कार्रवाई के बजाय संरक्षण की भूमिका निभाई, जिससे प्रकरण बार-बार दबता चला गया।

मामला जब लगातार उठता रहा, तो हाल ही में एक नई जांच टीम गठित करने का आदेश दिया गया। जांजगीर-चांपा के जिला शिक्षा अधिकारी अशोक सिन्हा को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई। लेकिन एक महीना बीत जाने के बाद भी फाइल आगे नहीं बढ़ी है।

अशोक सिन्हा ने इस पर कहा है कि जांच प्रक्रिया जारी है और जैसे ही जांच पूरी होगी, रिपोर्ट पेश की जाएगी। लेकिन सवाल यही है—जांच पूरी होने तक कार्रवाई शून्य क्यों है? और आरटीआई का जवाब अब तक क्यों नहीं दिया गया?

पूरा मामला अब एक पैटर्न की ओर इशारा कर रहा है। आरोप हैं कि सौम्या जोहोआस का मामला अकेला नहीं है, बल्कि इसी तरह के कई मामलों में नियमों को दरकिनार कर नियुक्तियां दी गईं। यानी यह एक सिस्टमेटिक तरीका है, जहां फाइलों को इस तरह तैयार किया जाता है कि नियम खुद बेमानी हो जाएं।

अंकित गौराहा का पक्ष:

अंकित गौराहा साफ कहते हैं कि यह मामला सिर्फ एक नियुक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के भ्रष्ट ढांचे का उदाहरण है। उनका कहना है कि उन्होंने हर स्तर पर शिकायत की, प्रमाण दिए, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ जांच का दिखावा हुआ।

वे आरोप लगाते हैं कि जानकारी मांगी गई लेकिन अभी तक नहीं मिली हैl जिससे साफ है कि सच्चाई छुपाने की कोशिश हो रही है।

उन्होंने साफ चेतावनी दी है कि अगर जल्द कार्रवाई नहीं होती, तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे और पूरे मामले को उजागर करेंगे।

धूल खा रही फाइल मेरे पुराने अरे आप बहुत कॉल करती ह

फिलहाल तस्वीर साफ है—फाइलें धूल खा रही हैं, जांच समितियां सन्नाटा ओढ़े बैठी हैं और सिस्टम अपने ही बनाए जाल में उलझा नजर आ रहा है।

यह मामला अब सिर्फ अनुकंपा नियुक्ति का नहीं रहा—यह उस तंत्र की कहानी बन गया है, जहां संरक्षण ताकतवर है और नियम कमजोर। अब देखना यह है कि यह जांच सच सामने लाती है या फिर एक और फाइल बनकर हमेशा के लिए दब जाती है।