SC Review Pition On TET/भोपाल। मध्य प्रदेश के शिक्षा जगत में इन दिनों एक बड़े फैसले को लेकर हड़कंप मचा हुआ है। स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा करीब 1 लाख से ज्यादा पुराने शिक्षकों के लिए ‘शिक्षक पात्रता परीक्षा’ (TET) अनिवार्य किए जाने के आदेश ने गुरुजी की रातों की नींद उड़ा दी है।

हैरानी की बात यह है कि इस मुद्दे पर न केवल विपक्षी दल कांग्रेस, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के अपने सांसद और विधायक भी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार के खिलाफ लामबंद होते नजर आ रहे हैं। मामला अब तूल पकड़ चुका है और सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन (पुनर्विचार याचिका) दायर करने की मांग तेज हो गई है।

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मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग और लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) ने हाल ही में एक विवादित निर्देश जारी किया है। इसके तहत, शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) 2009 लागू होने से पहले नियुक्त हुए उन सभी शिक्षकों को अब टीईटी परीक्षा पास करना अनिवार्य होगा, जिनकी सेवानिवृत्ति में 5 साल से अधिक का समय शेष है।

सरकार ने इसके लिए दो साल की समय सीमा तय की है और चेतावनी दी है कि यदि तय समय में परीक्षा पास नहीं की गई, तो संबंधित शिक्षक को सेवा से मुक्त किया जा सकता है। विभाग का यह कदम सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देकर उठाया गया है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसने डेढ़ लाख परिवारों के भविष्य पर संकट के बादल मंडरा दिए हैं।

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इस फैसले के खिलाफ पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता पीसी शर्मा ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। शर्मा का कहना है कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति दशकों पहले तत्कालीन वैध नियमों और योग्यताओं के आधार पर हो चुकी है, उन्हें अब इस उम्र में दोबारा परीक्षा के लिए बाध्य करना मानसिक प्रताड़ना जैसा है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को अन्य राज्यों की तरह सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर करनी चाहिए।

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पीसीसी चीफ जीतू पटवारी ने भी सरकार को घेरते हुए कहा कि अनुभवी शिक्षकों से परीक्षा लेने के बजाय उनकी ट्रेनिंग कराई जानी चाहिए, जिससे गुणवत्ता में सुधार हो। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार शिक्षकों के बीच डर का माहौल बना रही है, जो शिक्षा व्यवस्था के लिए घातक है।

हैरानी की बात यह है कि इस मुद्दे पर भाजपा के भीतर से भी विरोध के स्वर मुखर हो गए हैं। होशंगाबाद से भाजपा सांसद दर्शन सिंह चौधरी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पत्र लिखकर डेढ लाख शिक्षकों के हितों की रक्षा करने की गुहार लगाई है। उन्होंने लिखा कि 25-25 साल से सेवा दे रहे शिक्षकों के सामने अब नौकरी जाने का खतरा पैदा हो गया है, जबकि उनकी भर्ती राज्य सरकार के वैधानिक प्रावधानों के अनुसार ही हुई थी। उनके अलावा भाजपा विधायक नागेंद्र सिंह और पूर्व विधायक मुरलीधर पाटीदार भी अपनी ही सरकार से इस फैसले को वापस लेने या कोर्ट में चुनौती देने की अपील कर चुके हैं।

शिक्षकों का तर्क है कि उनके पास पहले से ही डीएड और बीएड जैसी अनिवार्य डिग्रियां हैं और वे समय-समय पर विभागीय ट्रेनिंग भी लेते रहे हैं। अब करियर के अंतिम पड़ाव पर आकर दोबारा पात्रता साबित करने की शर्त उन्हें अपमानजनक लग रही है। जुलाई-अगस्त 2026 में संभावित इस परीक्षा को लेकर प्रदेश भर के शिक्षक संगठनों ने आंदोलन की चेतावनी भी दी है। अब देखना यह होगा कि चारों तरफ से घिरी मोहन सरकार अपने इस फैसले पर अडिग रहती है या अपनी ही पार्टी के नेताओं और शिक्षकों के दबाव में आकर कोई बीच का रास्ता निकालती है।