बिलासपुर (मनीष जायसवाल) । आवारा कुत्तों पर मचा बवाल अब शिक्षा विभाग की दीवारों से निकलकर गलियों-चौराहों तक पहुंच गया है। सवाल उठ रहे है कि क्या अब प्राचार्य और प्रधान पाठक स्कूल में बच्चों की नहीं, बल्कि कुत्तों की निगरानी करेंगे..? बिलासपुर में डीपीआई के एक आदेश ने पूरे महकमे को हतप्रभ कर दिया है।विभाग के मंत्री भी इस सवाल से उपजे विवाद पर अपनी अलग ही राय रख चुके है। जो जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाती । शिक्षक गुस्से में है। ऐसे आदेश जारी करने वालों पर हंसते हुए विभाग में बैठे हुए व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों की समझ पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं..!

सर्व शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप पांडे बताते हैं कि यह आदेश शिक्षकों में आक्रोश भी जगा रहा है और व्यंग्य का नया बाज़ार भी खोल रहा है। शिक्षकों के बीच सोशल मीडिया पर मीम, चुटकुले और तंज ऐसे दौड़ रहे है जैसे विभाग ने शिक्षा नहीं कुनबा-कुत्ता विश्लेषण का नया पाठ्यक्रम शुरू कर दिया हो..। और डीपीआई ने बाकायदा प्राचार्य और प्रधान पाठकों को कुत्तों की निगरानी के लिए नोडल अफसर नियुक्त कर दिया है।

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स्थिति विडंबना पूर्ण है कि विभाग एक ओर शिक्षा गुणवत्ता वर्ष और मुख्यमंत्री शिक्षा गुणवत्ता अभियान के बड़े-बड़े पोस्टर चिपका रहा है, और दूसरी ओर शिक्षकों को मतदाता सूची जांच से लेकर कुत्ता-पशु प्रबंधन तक हर गैर-शैक्षणिक कार्य में उलझाया हुआ है। प्रदीप आगे कहते है कि यह आदेश जैसे ही सोशल मिडिया समूहों में पहुंचा शिक्षकों की प्रतिक्रिया भी दो रंगों में सामने आई है जो आक्रोश और हास्य के रूप में थी। कुछ शिक्षक मजाक में कहने लगे हैं कि कुत्ता-प्रशिक्षण कार्यशाला कब होगी..? तो कुछ ने तंज कसा कि अब कुत्तों की नस्ल, रंग और स्वभाव पढ़ना भी शिक्षक पात्रता परीक्षा का हिस्सा बन जाएगा..!

सर्व शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप पांडे बताते हैं कि इसी बीच एक प्रपत्र वायरल हुआ, जिसकी पुष्टि संघ नहीं करता है। उस कथित फॉर्म में कुत्तों के लिंग से लेकर रंग तक, और यहां तक कि यह भी भरने के कॉलम हैं कि कुत्ता आवारा है, पालतू है या सिर्फ स्कूल से गुजरने वाला मेहमान है। शिक्षक कह रहे हैं कि अगर इस तरह का फॉर्म भरना पड़ेगा तो स्कूल के गेट पर दर्शित कुत्तों की सूची भी टांगनी पड़ेगी..।

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प्रदीप का कहना है कि शिक्षक किसी भी आपात स्थिति में हमेशा आगे आते है। चाहे स्कूल में सांप निकले, पशु घुस जाए, भटके हुए कुत्ते हों या कोई शराबी परिसर में आ जाए। शिक्षक बिना किसी आदेश के बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए खुद समाने खड़े रहते हैं। ऐसे में कुत्तों की निगरानी का कोई अलग से आदेश जारी करना, न शिक्षक की गरिमा के अनुरूप है, न विभाग की समझदारी के..।

सोशल मीडिया पर माहौल इतना दिलचस्प हो गया है कि लोग खुले आम मजाक कर रहे है कि स्कूल में आज कौन-कौन सा कुत्ता आया.? लोग पूछ रहे है कि गांव वाले कुत्ते और शहर वाले कुत्ते को कैसे भगाया जाता है । कुत्ता पागल है या नही, बीमार है या नही, यहां क्यों आया है। यह सब रिपोर्ट में यह भी लिखना पड़ेगा क्या..? संस्था प्रमुख अब कुत्ता-डायरी भी मेंटेन करेंगे क्या..?

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प्रदीप पांडे बताते हैं कि शिक्षक अब शिक्षा विभाग की समझदारी पर भी प्रश्नचिन्ह लगा रहा है..। प्रदीप की मांग है कि इस आदेश को तुरंत वापस लिया जाए, क्योंकि शिक्षकों को बच्चों की सुरक्षा का प्रशिक्षण दिया जाता है, कुत्तों की जनगणना का नही..। अब चर्चा तो इस बात को लेकर भी हो रही है कि शिक्षक समाज को विभाग किसी दिशा में लेकर जा रहा है..। यह चिंतन अब सत्ता में बैठे जिम्मेदार लोगों को करना है..। क्योंकि विभाग के जिम्मेदार लोग तो शिक्षकों के आक्रोश के मीटर को हर 15 दिन में बढ़ाने का प्रयास कर रहे है..।