बिलासपुर..सरकंडा थाना में दर्ज आर्थिक सहायता प्रकरणों में राजस्व विभाग के रीडरों लिपिकों के खिलाफ हो रही पुलिस कार्रवाई के विरोध में मंगलवार को छत्तीसगढ़ प्रदेश राजस्व लिपिक संघ ने कलेक्टोरेट का घेराव किया। प्रदेश राजस्व लिपिक संघ के प्रांताध्यक्ष रोहित तिवारी की अगुवाई में जिलेभर से पहुंचे लिपिकों ने संभागायुक्त, पुलिस महानिरीक्षक और कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपकर पुलिस कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाने की मांग की। इस दौरान जिला राजस्व लिपिक संघ के अध्यक्ष सूर्य प्रकाश कश्यप सहित बड़ी संख्या में राजस्व लिपिक मौजूद रहे। संघ का आरोप है कि पर्याप्त जांच किए बिना केवल रीडरों को आरोपी बनाया जा रहा है, जबकि आदेश पारित करने वाले सक्षम अधिकारियों की भूमिका की अनदेखी की जा रही है।

ज्ञापन में बताया गया कि सरकंडा थाना के अपराध 936/2026, 937/2026 और 938/2026 में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 468, 471 और 34 तथा भारतीय न्याय संहिता  की धारा 318(क), 336, 338 एवं 340(2)(3)(5) के तहत दर्ज मामलों में तीन राजस्व लिपिकों को बिना पूर्व सूचना गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इसके बाद संघ ने कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी तथा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन देकर बिना समुचित जांच गिरफ्तारी पर रोक लगाने का आग्रह किया था।

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संघ के अनुसार इसके बावजूद थाना प्रभारी सरकंडा ने 18 जुलाई 2026 को नोटिस जारी कर आठ अन्य लिपिकों को 23 जुलाई 2026 को बयान के लिए थाने बुलाया। सभी आठ लिपिक निर्धारित तिथि पर उपस्थित हुए और विवेचना में पूरा सहयोग दिया, लेकिन उनके विरुद्ध भी कार्रवाई की आशंका बनी हुई है। इससे पूरे राजस्व लिपिक वर्ग में असुरक्षा और भय का वातावरण है।

ज्ञापन में आर्थिक सहायता स्वीकृत करने की पूरी प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा गया कि प्राकृतिक आपदा में मृतकों के परिजनों को चार लाख रुपये की सहायता राशि देने की प्रक्रिया राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग की अधिसूचनाओं के अनुसार संचालित होती है। पीड़ित परिवार अथवा उसका अधिकृत प्रतिनिधि तहसीलदार या अतिरिक्त तहसीलदार के समक्ष आवेदन और शपथपत्र प्रस्तुत करता है। इसके बाद रीडर केवल प्रकरण पंजीबद्ध कर सक्षम पीठासीन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करता है तथा न्यायालयीन अभिलेखों का संधारण और नस्तीबद्ध होने के बाद अभिलेखागार में जमा कराने का दायित्व निभाता है।

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संघ का कहना है कि रीडर का कार्य दस्तावेजों की सत्यता की जांच या उनका सत्यापन करना नहीं होता। अंतिम निर्णय पूरी तरह पीठासीन अधिकारी द्वारा लिया जाता है। ऐसे में केवल दस्तावेज प्रस्तुत करने वाले रीडरों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई स्थापित विधिक सिद्धांतों के विपरीत है।

ज्ञापन में यह भी कहा गया कि यदि आवेदकों ने कथित रूप से जाली हस्ताक्षर, फर्जी सील और झूठे शपथपत्रों के आधार पर आदेश प्राप्त किए हैं तो उन दस्तावेजों की सत्यता और आदेश पारित करने की पूरी प्रक्रिया की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। संघ ने कहा कि जिन प्रकरणों में आर्थिक सहायता स्वीकृत हुई, वे तीन अलग-अलग पीठासीन अधिकारियों के न्यायालयों से सुनवाई के बाद पारित हुए थे। इसलिए केवल रीडरों को आरोपी बनाना न्यायोचित नहीं है।

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संघ ने पुलिस अधीक्षक को सौंपे एक अन्य आवेदन में मांग की कि विवेचना के दौरान यदि किसी ने न्यायालय के समक्ष मिथ्या तथ्य अथवा कूटरचित दस्तावेज प्रस्तुत किया है तो ऐसे लोगों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 227 से 231 सहित अन्य उपयुक्त धाराओं के तहत भी कार्रवाई की जाए।

प्रांताध्यक्ष रोहित तिवारी ने कहा कि राजस्व लिपिक केवल न्यायालयीन प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, निर्णय लेने वाले अधिकारी नहीं। निष्पक्ष जांच से पहले कर्मचारियों की गिरफ्तारी न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि इससे पूरे राजस्व तंत्र का मनोबल प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि संघ किसी दोषी को बचाने के पक्ष में नहीं है, लेकिन वास्तविक दोषियों की पहचान कर उन्हीं के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए।

संघ ने चेतावनी दी कि यदि एकतरफा कार्रवाई नहीं रुकी और लिपिकों को विधिक संरक्षण नहीं मिला तो छत्तीसगढ़ प्रदेश राजस्व लिपिक संघ प्रदेशव्यापी आंदोलन, सामूहिक अवकाश और धरना-प्रदर्शन के लिए बाध्य होगा।