बिलासपुर।छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय में अनुकंपा नियुक्ति के एक मामले को लेकर सवाल उठे हैं।

आरोप है कि विभागीय नियमों और जांच कमेटी की सलाह को नजरअंदाज कर एक दिवंगत कर्मचारी के परिवार से जुड़े विवादित मामले में नियुक्ति का आदेश जारी किया गया।

मीडिया रिपोर्ट अनुसार शिकायत के बाद गठित जांच कमेटी की रिपोर्ट में कर्मचारी की सर्विस बुक पर तत्कालीन आहरण-संवितरण अधिकारी (BEO/DDO) के प्रमाणीकरण और हस्ताक्षर नहीं होने का उल्लेख किया गया है।

हालांकि, इन तथ्यों के आधार पर नियुक्ति को अवैध घोषित करने या किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय करने के लिए विभागीय और कानूनी स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।

मीडिया रिपोर्ट अनुसार मामला तखतपुर विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय में पदस्थ रहे चपरासी स्वर्गीय ओमप्रकाश साहू की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ओमप्रकाश साहू का निधन 3 जून 2020 को हुआ था।

इसके बाद उनकी दूसरी पत्नी यज्ञ साहू ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन दिया था। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने 30 जून 2021 को जारी पत्र में पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति देने का प्रावधान नहीं होने का हवाला देते हुए आवेदन खारिज कर दिया था।

बताया गया है कि वर्ष 2025 में दूसरी पत्नी का बेटा यश साहू 18 वर्ष का हुआ, जिसके बाद नियुक्ति से संबंधित फाइल फिर से आगे बढ़ाई गई। आरोप है कि इसी प्रक्रिया के तहत सिरगिट्टी हायर सेकेंडरी स्कूल में चपरासी के रिक्त पद पर नियुक्ति का आदेश जारी किया गया।

इस प्रक्रिया में तत्कालीन डीईओ विजय टांडे और कार्यालयीन कर्मचारी सुनील यादव की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण होगा।

शिकायत मिलने के बाद विभाग ने चार सदस्यीय जांच कमेटी गठित की थी। इसमें प्राचार्य जितेंद्र खोबरागड़े, मस्तूरी बीईओ शिवराम टंडन, बिल्हा बीईओ भूपेंद्र कौशिक और कार्यालयीन कर्मचारी गोविंद वैष्णव शामिल थे।

शिकायत में उपलब्ध जांच रिपोर्ट के बिंदु 3(ii) के अनुसार, स्वर्गीय ओमप्रकाश साहू की सर्विस बुक में पहली पत्नी, दूसरी पत्नी और दूसरी पत्नी के बेटे यश साहू के नाम दर्ज थे, लेकिन संबंधित प्रविष्टियों पर तत्कालीन आहरण-संवितरण अधिकारी का प्रमाणीकरण या हस्ताक्षर नहीं होने की बात सामने आई।

इस बिंदु को नियुक्ति प्रक्रिया की वैधता से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल माना जा रहा है। हालांकि, सर्विस बुक में हस्ताक्षर नहीं होने का तथ्य अपने आप में नियुक्ति को अवैध सिद्ध करता है या नहीं, यह लागू सेवा नियमों, अन्य अभिलेखों और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर निर्भर करेगा।

मामले में एक और सवाल 50 रुपये के स्टांप पेपर पर तैयार नोटरी और आपसी सहमति के दस्तावेजों के आधार पर नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ाने को लेकर उठाया गया है। शिकायत पक्ष का आरोप है कि परिवार के सदस्यों के बीच वैधानिक उत्तराधिकार और पात्रता से जुड़े विवाद का निराकरण कराने के लिए आवश्यक कानूनी दस्तावेजों की पर्याप्त जांच नहीं की गई।

हालांकि, अनुकंपा नियुक्ति के लिए कौन-सा प्रमाणपत्र अनिवार्य था, यह संबंधित शासनादेश और मामले की परिस्थितियों के आधार पर तय होगा।

जांच कमेटी की रिपोर्ट में कथित तौर पर यह सलाह भी दी गई थी कि दूसरी पत्नी के बेटे को अनुकंपा नियुक्ति देना कानूनी रूप से उचित है या नहीं, इस पर विधिक राय ली जानी चाहिए। रिपोर्ट में सामान्य प्रशासन विभाग के नियमों में इस तरह की स्थिति के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं होने का उल्लेख किए जाने की बात कही गई है। आरोप है कि इस सलाह के बावजूद नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई। नियुक्ति को सही ठहराने के लिए विभागीय नोटशीट में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिए जाने की भी जानकारी सामने आई है। इन फैसलों की प्रासंगिकता और मामले पर उनकी लागू होने की स्थिति की स्वतंत्र कानूनी जांच जरूरी होगी।

शिक्षा विभाग में इससे पहले मुंगेली जिले में अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामले में तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी एनके द्विवेदी को सेवा से बर्खास्त किए जाने का मामला भी सामने आया था। हालांकि, मुंगेली की कार्रवाई और बिलासपुर के मौजूदा प्रकरण के तथ्य अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए दोनों मामलों में कार्रवाई की तुलना संबंधित जांच निष्कर्षों और आदेशों के आधार पर ही की जानी चाहिए।

फिलहाल बिलासपुर के इस मामले में प्रमुख सवाल यह हैं कि नियुक्ति के लिए पात्रता का निर्धारण किन दस्तावेजों के आधार पर किया गया, जांच कमेटी की विधिक राय लेने संबंधी सलाह पर अमल क्यों नहीं हुआ और सर्विस बुक की प्रविष्टियों के प्रमाणीकरण की स्थिति क्या थी।

इन बिंदुओं पर विभागीय स्तर पर तथ्यात्मक जांच और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही जिम्मेदारी और नियुक्ति की वैधता को लेकर स्पष्ट निष्कर्ष निकाला जा सकेगा।