बिलासपुर… वार्ड क्रमांक-10 में तेजी से फैली कॉलोनियों की पड़ताल अब सिर्फ कृषि भूमि के सिकुड़ने तक सीमित नहीं रह गई है। जांच की अगली परत उन कॉलोनियों तक पहुंचती है, जहां स्थानीय लोगों के अनुसार निजी डेवलपर्स के जिम्मे आने वाले कार्यों में भी नगर निगम की निधि और संसाधनों का इस्तेमाल हुआ है। सवाल यह है कि आखिर निजी कॉलोनियों के विकास का बोझ सरकारी खजाने पर क्यों डाला गया?

कॉलोनी निजी, फिर सड़कें सरकारी पैसे से क्यों?

महावीर कॉलोनी, भार्गव वाटिका, एनविल कॉलोनी, चित्रकूट समेत कई ऐसी बस्तियों का उल्लेख स्थानीय लोग करते हैं, जहां सड़क, पहुंच मार्ग और अन्य विकास कार्यों में नगर निगम की भूमिका दिखाई देती है। जबकि सामान्य नियमों के अनुसार जब तक कोई कॉलोनी विधिवत विकसित होकर निगम को हस्तांतरित नहीं होती, तब तक वहां के अधिकांश विकास कार्यों की जिम्मेदारी संबंधित कॉलोनाइजर या डेवलपर की होती है।

यही वह बिंदु है जहां वार्ड-10 में कई सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि कॉलोनियां निजी हैं और निगम को हस्तांतरित नहीं हुई हैं, तो वहां सार्वजनिक धन खर्च करने का आधार क्या था?

कुकुरमुत्तों की तरह उगी कॉलोनियां, नियंत्रण किसका?

वार्ड-10 के कई हिस्सों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान तेजी से प्लॉटिंग और निर्माण हुआ है। अनेक स्थानों पर मकान निर्माण की रफ्तार इतनी तेज है कि स्थानीय लोग इसे “कुकुरमुत्तों की तरह उगी कॉलोनियां” कहकर संबोधित कर रहे हैं।

मौके पर देखने से कई क्षेत्रों में यह सवाल उभरता है कि क्या सभी निर्माण वैधानिक स्वीकृतियों के साथ हो रहे हैं? क्या प्रत्येक भवन का नक्शा स्वीकृत है? क्या सभी कॉलोनियां नियमानुसार विकसित हुई हैं? इन प्रश्नों का स्पष्ट जवाब जिम्मेदार विभागों को देना होगा।

डेवलपमेंट चार्ज और अनुमति प्रक्रिया पर भी सवाल

नियमों के अनुसार किसी भी वैध कॉलोनी और भवन निर्माण के लिए निर्धारित प्रक्रिया, शुल्क, डेवलपमेंट चार्ज तथा अन्य स्वीकृतियां आवश्यक होती हैं। इन्हीं प्रक्रियाओं के जरिए नगर निकायों को राजस्व प्राप्त होता है और नागरिक सुविधाओं का ढांचा मजबूत होता है।

लेकिन वार्ड-10 में स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि कई क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियां प्रशासनिक निगरानी से कहीं अधिक तेज गति से बढ़ीं। यदि ऐसा है तो संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

कांग्रेस पार्षद के वार्ड में सबसे ज्यादा सवाल

वार्ड क्रमांक-10 का प्रतिनिधित्व कांग्रेस के पार्षद के पास है। ऐसे में विपक्ष और स्थानीय नागरिक यह सवाल उठा रहे हैं कि जिन क्षेत्रों में निजी कॉलोनियों के बीच निगम निधि से कार्य होने के आरोप लग रहे हैं, वहां जनप्रतिनिधि की भूमिका क्या रही?
यह भी चर्चा का विषय है कि विकास कार्यों की प्राथमिकता तय करते समय किन मानकों का पालन किया गया और किन आधारों पर कुछ क्षेत्रों को विशेष महत्व मिला।

सबसे बड़ा सवाल: नियम ताक पर रखे गए या सब कुछ वैध है?

पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या वार्ड-10 में विकसित हुई सभी कॉलोनियां नियमानुसार स्वीकृत हैं? यदि हां, तो संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए। और यदि कहीं नियमों की अनदेखी हुई है, तो जिम्मेदारी सिर्फ कॉलोनाइजरों की नहीं बल्कि निगरानी करने वाले विभागों और अधिकारियों की भी तय होनी चाहिए।

वार्ड-10 की यह कहानी अब केवल खेतों के गायब होने की नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम की पड़ताल की मांग कर रही है जिसके बीच जमीन, कॉलोनियां और सरकारी संसाधन एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई दे रहे हैं।