सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका को लेकर विवादित सामग्री लिखने वाले तीन प्रमुख शिक्षाविदों की माफी को स्वीकार कर लिया है। शुक्रवार को शीर्ष अदालत ने इस मामले में एक अहम मोड़ देते हुए प्रोफेसर माइकल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार के खिलाफ जारी अपने पिछले सख्त आदेश को वापस ले लिया।

ज्ञात हो कि इस साल मार्च में अदालत ने इन तीनों शिक्षाविदों को भविष्य में किसी भी पाठ्यपुस्तक लेखन या पाठ्यक्रम निर्माण की गतिविधियों से अलग रखने (ब्लैकलिस्ट करने) का निर्देश केंद्र और राज्य सरकारों को दिया था, जिसे अब रद्द कर दिया गया है।

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यह पूरा मामला एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की पुस्तक ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ (Exploring Society: India and Beyond) के चौथे अध्याय से जुड़ा था।

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इस अध्याय में देश की न्यायपालिका की भूमिका पर चर्चा करते समय ‘भ्रष्टाचार’ और ‘बैकलॉग’ (लंबित मामले) जैसे संवेदनशील मुद्दों का जिक्र किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस सामग्री को न्यायपालिका की गरिमा और शुचिता पर हमला मानते हुए इसे ‘पूरी तरह से अवांछनीय’ करार दिया था। कोर्ट ने इस पर स्वतः संज्ञान लेते हुए पुस्तक के पूरे संस्करण को बाजार से वापस लेने का आदेश दिया था और लेखकों के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की थी।

ताजा सुनवाई के दौरान अदालत ने स्वीकार किया कि हालांकि अध्याय की सामग्री अनुचित थी, लेकिन शिक्षाविदों द्वारा दी गई व्याख्या और उनके माफीनामे को देखते हुए उनके करियर पर पाबंदी लगाना सही नहीं होगा।

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कोर्ट ने अपने आदेश के ‘पैरा 8’ में संशोधन करते हुए सरकारों और शैक्षणिक संस्थानों को दिए गए उस निर्देश को हटा दिया है, जिसमें इन तीनों को शैक्षणिक गतिविधियों से प्रतिबंधित किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका के बारे में दी जाने वाली जानकारी हमेशा संतुलित, तथ्यात्मक और सही होनी चाहिए, ताकि भावी पीढ़ी के मन में संवैधानिक संस्थाओं के प्रति गलत धारणा न बने।

इस मामले में एनसीईआरटी ने पहले ही अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी मांग ली थी और विवादित पुस्तक को सभी वितरण केंद्रों से वापस मंगा लिया था। शिक्षाविदों ने भी अदालत से गुहार लगाई थी कि उनके खिलाफ की गई ‘ब्लैकलिस्टिंग’ की टिप्पणी उनके पेशेवर करियर को नुकसान पहुंचा सकती है, जिसे कोर्ट ने अब उदारता दिखाते हुए वापस ले लिया है। इस फैसले के साथ ही अब ये तीनों शिक्षाविद भविष्य में पुनः शैक्षणिक और पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रियाओं का हिस्सा बन सकेंगे।