Narottam mishra datia ticket/दतिया: मध्य प्रदेश और बिहार की दो हाई-प्रोफाइल विधानसभा सीटों पर होने वाले आगामी उपचुनाव भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए बड़ी सिरदर्दी बन गए हैं।

Narottam mishra datia ticket/एक तरफ जहां बिहार की बांकीपुर सीट पर चौतरफा दबाव के बाद भाजपा को ऐन वक्त पर अपना उम्मीदवार बदलना पड़ा और अभिषेक कुमार बंटी की जगह नीरज सिन्हा को टिकट देना पड़ा, जिनका मुकाबला प्रशांत किशोर की पार्टी से होगा।

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वहीं दूसरी तरफ, मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट के लिए की गई घोषणा ने राजनीतिक गलियारों में भूकंप ला दिया है। भाजपा ने दतिया से मध्य प्रदेश के पूर्व ताकतवर गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए आशुतोष तिवारी को अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया है।

इस चौंकाने वाले फैसले के बाद दतिया में स्थिति बेकाबू हो गई है। पिछले कई महीनों से क्षेत्र में सक्रिय नरोत्तम मिश्रा की टिकट कटने की खबर आते ही उनके समर्थकों और नाराज भाजपा कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा। जिला, मंडल और बूथ स्तर पर पार्टी के सैकड़ों पदाधिकारियों ने विरोध स्वरूप अपने पदों से सामूहिक इस्तीफा दे दिया है।

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शुक्रवार शाम को उग्र प्रदर्शनकारियों ने नेशनल हाईवे पर चक्काजाम कर दिया, जो पूरी रात जारी रहा। प्रशासन और पुलिस ने जब जाम खुलवाने और समझाइश की कोशिश की, तो प्रदर्शन हिंसक हो गया। भाजपा नेतृत्व के खिलाफ नारेबाजी कर रहे कार्यकर्ताओं की पुलिस से सीधी झड़प हो गई, जिसमें आठ पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए और कई पुलिस वाहनों व ट्रकों को भारी नुकसान पहुंचाया गया है।

नरोत्तम मिश्रा ने तोड़ी चुप्पी, कैलाश विजयवर्गीय बोले- फैसला नहीं बदलेगा

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शनिवार को इस पूरे घटनाक्रम पर पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने अपनी चुप्पी तोड़ी। उन्होंने सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर उग्र हो रहे अपने समर्थकों से शांति बनाए रखने की अपील की। नरोत्तम मिश्रा ने कहा, “यह पार्टी का शीर्ष फैसला है। मैंने सोशल मीडिया पर कुछ कार्यकर्ताओं को खुद पर पेट्रोल और केरोसीन डालते हुए देखा है, मैं उनसे कहना चाहूंगा कि ऐसे आत्मघाती कदम न उठाएं। आप अपनी बात पूरी मर्यादा के साथ सही तरीके से पार्टी फोरम के सामने रख सकते हैं।”

इस बीच मामले की गंभीरता को देखते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने साफ संदेश देते हुए कहा, “केंद्रीय नेतृत्व ने काफी सोच-समझकर यह फैसला लिया है और फैसला वापस नहीं होगा। नरोत्तम जी पार्टी के बेहद पुराने और वफादार कार्यकर्ता हैं, उनसे बातचीत कर मामला जल्द ही सुलझा लिया जाएगा।”

आखिर क्यों कटा छह बार के विधायक का टिकट? नरोत्तम मिश्रा के करीबी सूत्रों का दावा है कि उन्हें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सहित राज्य नेतृत्व से हरी झंडी मिल चुकी थी, जिसके बाद उन्होंने नामांकन फॉर्म भी खरीद लिया था। हालांकि, ऐन वक्त पर उनका नाम गायब होने के पीछे तीन बड़े कारण सामने आ रहे हैं:

कमजोर फीडबैक और एंटी-इनकंबेंसी: खुफिया और सांगठनिक स्तर पर पार्टी को मिले जमीनी फीडबैक में यह बात सामने आई थी कि दतिया में नरोत्तम मिश्रा की स्थिति शुरुआती अनुमानों से कहीं ज्यादा कमजोर थी। साल 2023 के मुख्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती से मिली हार ने उनकी ‘अजेय’ होने की छवि को पहले ही तोड़ दिया था। जनता और स्थानीय नेताओं में उनके खिलाफ भारी सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकंबेंसी) देखी जा रही थी।

पारिवारिक पॉलिटिकल इकोसिस्टम पर सवाल: पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, नरोत्तम मिश्रा के बेटे सुकर्ण मिश्रा और उनके परिवार के इर्द-गिर्द बने राजनीतिक तंत्र को लेकर स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी थी। पिछले चुनाव में उनके बेटे की कथित मनमानी की कुछ घटनाओं ने पार्टी की छवि खराब की थी और संगठन का मानना था कि यह नकारात्मक फैक्टर अभी भी क्षेत्र में हावी है।

प्रशासनिक पावर गेम और नए पावर सेंटर का डर: शिवराज सिंह चौहान की पिछली सरकार में नरोत्तम मिश्रा वास्तविक रूप से ‘नंबर-2’ की हैसियत रखते थे। कहा जाता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री भी उनकी सहमति के बिना गृह विभाग में स्वतंत्र रूप से काम नहीं करवा पाते थे।

वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पिछले दो सालों से राज्य की कमान संभाल रहे हैं और वे पहले ही कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे कई बड़े क्षत्रपों के राजनीतिक दबाव का सामना कर रहे हैं। ऐसे में दतिया से नरोत्तम मिश्रा की जीत का मतलब सीधे एक भारी-भरकम पोर्टफोलियो के साथ कैबिनेट में उनकी वापसी होती, जिससे राज्य में एक और नया ‘पावर सेंटर’ खड़ा हो जाता। पार्टी का एक बड़ा धड़ा इस वक्त उनकी वापसी नहीं चाहता था।

आशुतोष तिवारी पर क्यों खेला दांव? नरोत्तम मिश्रा की जगह उतारे गए आशुतोष तिवारी का संघ (RSS) का मजबूत बैकग्राउंड है। वे भाजपा के संभागीय संगठन सचिव के रूप में कई वर्षों तक काम कर चुके हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वे स्थानीय गुटीय राजनीति से पूरी तरह दूर हैं। पार्टी ने दतिया सीट के जातीय गणित को ध्यान में रखते हुए ब्राह्मण कार्ड को बरकरार रखा और बेदाग छवि के कारण आशुतोष तिवारी पर भरोसा जताया।

भाजपा के सामने डैमेज कंट्रोल की बड़ी चुनौती.Narottam mishra datia ticket—- टिकट वितरण के बाद खड़ा हुआ यह बवंडर अब भाजपा के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है। ग्वालियर-चंबल संभाग में नरोत्तम मिश्रा जैसा मजबूत सांगठनिक नेटवर्क गिने-चुने नेताओं के पास ही है। जिला स्तर से लेकर बूथ स्तर तक का जो ढांचा उन्होंने खड़ा किया है, उसमें अधिकांश कार्यकर्ता आधिकारिक पार्टी उम्मीदवार के बजाय व्यक्तिगत रूप से नरोत्तम मिश्रा के प्रति वफादार हैं। ऐसे में यदि यह वफादार वोट बैंक और कार्यकर्ता घर बैठ गए या उन्होंने भीतरघात किया, तो भाजपा के लिए यह सीट निकालना नामुमकिन हो जाएगा।