भोपाल/रायपुर (मनीष जायसवाल) मध्यप्रदेश में सेवारत शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा की प्रक्रिया शुरू होते ही इसके सिलेबस और परीक्षा के पैटर्न को लेकर विवाद शुरू हो गया है। इधर छत्तीसगढ़ में सेवारत शिक्षकों के लिए विभागीय टेट और दूसरी मांगों को लेकर शिक्षक साझा मंच के बैनर तले विकास राजपूत, रविंद्र राठौर और प्रदीप पांडे के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा है। शनिवार 22 अगस्त को सेवा सुरक्षा न्याय यात्रा के तहत प्रदेश के 146 विकासखंडों में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों ने धरना, रैली और ज्ञापन के जरिए अपनी मांग शासन-प्रशासन तक पहुंचाई।

उधर मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल ने प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर पढ़ा रहे उन शिक्षकों के लिए पात्रता परीक्षा 2026 की नियम पुस्तिका जारी की है, जिन्होंने अभी तक टेट पास नहीं की है। इसके लिए ऑनलाइन आवेदन 21 अगस्त से 4 सितंबर तक किए जा सकेंगे। आवेदन में संशोधन की सुविधा 9 सितंबर तक रहेगी और परीक्षा 12 अक्टूबर 2026 से शुरू होगी।

सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर 2025 के आदेश के बाद सेवारत शिक्षकों के लिए टेट की अनिवार्यता सामने आई है। इसी कड़ी में
मध्यप्रदेश ने इसी के तहत सेवारत शिक्षकों के लिए अलग पात्रता परीक्षा कराने का फैसला लिया । परीक्षा 150 अंकों की होगी और ढाई घंटे का समय मिलेगा। सभी प्रश्न वस्तुनिष्ठ होंगे। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए 50 प्रतिशत तथा अन्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए 60 प्रतिशत अंक निर्धारित हैं।

इस परीक्षा के सिलेबस को लेकर मध्यप्रदेश के शिक्षक संगठनों ने आपत्ति जताई है। जॉइंट टीचर्स फ्रंट इंडिया के मीडिया प्रभारी हीरा नंद नरवरिया का कहना है कि विषयवार सिलेबस में काफी अंतर है। सामाजिक विज्ञान का सिलेबस बहुत लंबा है, वहीं गणित में त्रिकोणमिति के साथ विज्ञान की पांच यूनिट जोड़ दी गई हैं। उनका कहना है कि गणित शिक्षक से गणित के साथ विज्ञान की परीक्षा लेना उचित नहीं है।

नरवरिया का कहना है कि कक्षा 6 से 8 में गणित, सामाजिक विज्ञान और अंग्रेजी के अलग-अलग पद हैं। ऐसे में गणित के साथ विज्ञान जोड़ने की व्यवस्था पर सवाल उठता है। यदि गणित शिक्षक को दो विषय पढ़कर परीक्षा देनी है तो अंग्रेजी के साथ हिंदी या संस्कृत क्यों नहीं जोड़ी गई। उनका कहना है कि अलग-अलग विषयों के सिलेबस में समानता दिखाई नहीं देती।

30 से 32 साल से पढ़ा रहे शिक्षकों के लिए कंप्यूटर आधारित परीक्षा को लेकर भी नरवरिया ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि लंबे समय से स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों को सामान्य प्रतियोगी परीक्षार्थी की तरह परीक्षा में बैठाना व्यावहारिक नहीं है। परीक्षा फीस लिए जाने पर भी उन्होंने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि सेवारत शिक्षकों की परीक्षा का उद्देश्य और इसका सेवा से संबंध स्पष्ट होना चाहिए।

मध्यप्रदेश की व्यवस्था में यह बात महत्वपूर्ण है कि इस परीक्षा का रिजल्ट नई सरकारी शिक्षक भर्ती के लिए मान्य नहीं होगा। इसका उद्देश्य पहले से सेवा में काम कर रहे उन शिक्षकों को टेट की पात्रता देना है, जिन्होंने निर्धारित टेट पास नहीं की है। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के लिए अलग परीक्षा और सिलेबस रखा गया है। वहीं जिन शिक्षकों की रिटायरमेंट में पांच साल से कम समय बचा है, उन्हें टेट से छूट दी गई है। हालांकि प्रमोशन के लिए टेट पास करना जरूरी रहेगा।

परीक्षा के प्राथमिक स्तर के सिलेबस में बाल विकास एवं शिक्षा शास्त्र, भाषा एक, भाषा दो, गणित और पर्यावरण अध्ययन शामिल हैं। प्रश्न कक्षा 1 से 5 के प्रचलित सिलेबस और पाठ्य पुस्तकों के टॉपिक पर आधारित होंगे, लेकिन उनका कठिनाई स्तर हाईस्कूल तक रखा जा सकता है। यहीं से सेवारत शिक्षकों के लिए परीक्षा के स्तर को लेकर नई चर्चा शुरू होती है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि जिन शिक्षकों को कई साल का क्लासरूम एक्सपीरियंस है, उनके लिए परीक्षा तैयार करते समय उनके अनुभव और वर्तमान कार्य परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

छत्तीसगढ़ सहायक शिक्षक समग्र शिक्षक फेडरेशन के प्रदेश संयोजक मनीष मिश्रा का कहना है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में शिक्षकों के बनने की पृष्ठभूमि काफी हद तक एक जैसी रही है। दोनों जगह ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में शिक्षा व्यवस्था पहुंचाने के लिए स्थानीय स्तर पर शिक्षकों की नियुक्ति की गई। छत्तीसगढ़ की स्थिति राज्य बनने के बाद भी काफी अलग रही है।

मनीष मिश्रा के अनुसार रायपुर और बिलासपुर को छोड़ दें तो राज्य गठन के शुरुआती 8-10 साल तक प्रदेश के ज्यादातर जिले विकास की दौड़ में काफी पीछे थे। बस्तर, सरगुजा और दूसरे दूरस्थ इलाकों में स्कूलों तक पहुंच, आवागमन और संसाधनों की स्थिति चुनौतीपूर्ण थी। ऐसे क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर नियुक्त शिक्षकों ने स्कूलों को चलाने में बड़ी भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की शिक्षाकर्मी व्यवस्था को सामान्य प्रतियोगी भर्ती के नजरिए से देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। उस समय सरकार के सामने गांवों और दूरस्थ क्षेत्रों के स्कूलों तक शिक्षक पहुंचाने की बड़ी चुनौती थी। स्थानीय युवाओं को शिक्षाकर्मी बनाकर स्कूलों की जिम्मेदारी दी गई। इन शिक्षकों ने कठिन परिस्थितियों में काम करते हुए शिक्षा व्यवस्था को आगे बढ़ाया।

मनीष मिश्रा का कहना है कि आज उसी व्यवस्था से जुड़े शिक्षक नियमित शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ऐसे में सेवारत शिक्षकों के लिए टेट लागू करते समय उनकी नियुक्ति की पृष्ठभूमि, सेवा अनुभव और प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। यदि विभागीय टेट होती है तो उसका पैटर्न सामान्य प्रतियोगी परीक्षा जैसा नहीं होना चाहिए।

उनके मुताबिक मध्यप्रदेश में सेवारत शिक्षकों के लिए बनाई गई टेट व्यवस्था छत्तीसगढ़ के लिए एक रेफरेंस हो सकती है, लेकिन दोनों राज्यों की परिस्थितियों में अंतर भी है। छत्तीसगढ़ में विभागीय टेट का सिलेबस, प्रश्नों का लेवल, परीक्षा का पैटर्न और पासिंग मार्क्स तय करते समय यहां की शिक्षक भर्ती और शिक्षाकर्मी व्यवस्था के इतिहास को ध्यान में रखना जरूरी होगा।

छत्तीसगढ़ में शिक्षक संगठनों की मांग अब इसी दिशा में आगे बढ़ रही है कि यदि सेवारत शिक्षकों के लिए टेट जरूरी की जाती है तो परीक्षा ऐसी हो, जो उनकी सेवा, अनुभव और वर्तमान जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर तैयार की जाए। मध्यप्रदेश में परीक्षा शुरू होने से पहले सिलेबस पर उठे विवाद ने छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित विभागीय टेट के स्वरूप को लेकर चर्चा को और तेज कर दिया है।