CG News/छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय बिलासपुर ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) के एक विवादित मामले में अहम टिप्पणी करते हुए याचिका का निराकरण कर दिया है.

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक संबंधित विभाग अभ्यर्थी की नियुक्ति के दावे पर कोई अंतिम निर्णय नहीं ले लेता, तब तक इस स्तर पर दायर की गई याचिका पोषणीय (Maintainable) यानी सुनवाई योग्य नहीं है.

जस्टिस बी.डी. गुरु की एकल पीठ ने कोंडागांव निवासी वृद्ध महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें अपने लंबित आवेदन पर विभागीय स्तर पर कार्रवाई आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता दी है.

यह मामला बिलासपुर हाई कोर्ट पहुंचा था कोंडागांव जिले के माकड़ी की रहने वाली 61 वर्षीय जानी बाई देव की याचिका के जरिए जानी बाई देव के बेटे के निधन के बाद उनकी बहू पूर्णिमा देव (निवासी सितली, तहसील नगरी, जिला धमतरी) ने नियमानुसार अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था.

मृतक की 61 वर्षीय वृद्धा मां जानी बाई ने अपनी बहू पूर्णिमा देव के इस दावे पर आपत्ति जताते हुए 16 जून 2026 को जिला कार्यक्रम अधिकारी के समक्ष लिखित अभ्यावेदन (Representation) प्रस्तुत किया था.

अपनी आपत्ति पर कोई ठोस निर्णय न होता देख सास ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मांग की कि उनके लंबित अभ्यावेदन के आधार पर ही अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए.

राज्य सरकार और हाई कोर्ट का रुख

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष वस्तुस्थिति रखी. राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि पूर्णिमा देव के अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन पर जिला कार्यक्रम अधिकारी या सक्षम प्राधिकारी ने अभी तक कोई अंतिम आदेश या निर्णय पारित नहीं किया है. ऐसे में कोर्ट में दायर यह याचिका समय से पहले (Premature) है.

जस्टिस बी.डी. गुरु की पीठ ने राज्य सरकार के तर्कों से सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि जब तक सक्षम अधिकारी द्वारा कोई आदेश जारी नहीं किया जाता, तब तक अदालत का हस्तक्षेप उचित नहीं है.

हाई कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता जानी बाई देव को छूट दी है कि वे अपने 16 जून 2026 के लंबित अभ्यावेदन पर संबंधित प्रशासनिक अधिकारी के समक्ष नियमानुसार आगे की कार्रवाई जारी रख सकती हैं.