बिलासपुर.. महिला शिक्षिका से छेड़छाड़ और मारपीट के मामले में न्यायालय से कारावास की सजा मिलने के बाद भी शिक्षक विवेक गुप्ता के खिलाफ विभागीय कार्रवाई में देरी ने जिला शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला बेलमुंडी में पदस्थ शिक्षक के मामले में न्यायालय का फैसला सामने आने के बाद भी कार्रवाई नहीं होने का सवाल इसलिए गंभीर है, क्योंकि विभाग के जिला प्रमुख के मुताबिक अब उन्हें प्रकरण की जानकारी मिल चुकी है। सवाल यह है कि न्यायालय से सजा मिलने के बाद संबंधित शिक्षक के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करने के लिए विभाग को आखिर कितने दिनों तक इंतजार करना था?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, तखतपुर विकासखंड के एक शासकीय विद्यालय में करीब एक महीने पहले महिला शिक्षिका के साथ छेड़छाड़ और मारपीट की घटना हुई थी। शिक्षिका की शिकायत पर पुलिस ने अपराध दर्ज किया। मामले में न्यायालय ने शिक्षक विवेक गुप्ता को कारावास की सजा सुनाई। इसके बावजूद सजा सुनाए जाने के बाद भी संबंधित शिक्षक के विद्यालय में अध्यापन कार्य करते रहने की जानकारी सामने आई है। इस घटनाक्रम ने महिला कर्मचारियों की सुरक्षा, विभागीय अनुशासन और दोषसिद्धि के बाद सरकारी सेवा में कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कोर्ट का फैसला; फिर कार्रवाई में देरी क्यों?

मामले का सबसे अहम पहलू जिला शिक्षा विभाग की प्रतिक्रिया है। जिला शिक्षा अधिकारी संदीप पांडे के मुताबिक, विभाग को प्रकरण की जानकारी मिली है और न्यायालय के आदेश अथवा संबंधित पत्र का इंतजार किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि अब जानकारी मिलने के बाद शिक्षक के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी और बर्खास्तगी की कार्रवाई भी हो सकती है।

इस संबंध में जिला शिक्षा अधिकारी संदीप पांडे ने कहा, “हमें यह जानकारी मिली है और हम कोर्ट के आदेश का इंतजार कर रहे हैं। पत्र का इंतजार था। अब जानकारी मिली है तो शिक्षक के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी।”

जिला शिक्षा अधिकारी के इस बयान के बाद सवाल और तीखा हो जाता है। यदि विभाग को मामले की जानकारी पहले मिल गई थी, तो संबंधित आदेश प्राप्त करने और लागू सेवा नियमों के तहत कार्रवाई की प्रक्रिया में क्या कदम उठाए गए? क्या न्यायालय के फैसले के बाद विभाग ने स्वयं प्रकरण की स्थिति पता करने की कोशिश की? यदि नहीं, तो इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी? न्यायालय के फैसले के बाद कार्रवाई का मामला केवल एक पत्र की प्रतीक्षा तक सीमित रहना चाहिए या विभाग को समय रहते अपने स्तर पर भी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए थी?

शिकायत शाखा की जिम्मेदारी भी सवालों के घेरे में

जिला शिक्षा विभाग में शिकायत शाखा का संचालन बसंत प्रताप सिंह के जिम्मे बताया जाता है। ऐसे में यह जानना भी जरूरी है कि महिला शिक्षिका की शिकायत, पुलिस में दर्ज अपराध और न्यायालय से सजा तक पहुंचे इस प्रकरण की जानकारी विभागीय स्तर पर कब पहुंची। यदि समय रहते जानकारी उपलब्ध थी, तो संबंधित अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की? और यदि जानकारी नहीं थी, तो शिकायतों और गंभीर प्रकरणों की निगरानी करने वाली व्यवस्था की जवाबदेही क्या है?

यह मामला किसी सामान्य प्रशासनिक पत्राचार का नहीं, बल्कि महिला कर्मचारी से जुड़े गंभीर आरोपों में न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि के बाद की विभागीय कार्रवाई का है। ऐसे मामलों में देरी के कारण स्पष्ट होना जरूरी है, ताकि यह तय किया जा सके कि चूक कहां हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

सजा के बाद सेवा नियमों के तहत कार्रवाई

छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के नियम 19 में कुछ परिस्थितियों में आपराधिक दोषसिद्धि के आधार पर दंड देने की विशेष प्रक्रिया का प्रावधान है। संबंधित मामले में न्यायालय के फैसले, सजा के स्वरूप और लागू सेवा नियमों के आधार पर विभाग को उचित निर्णय लेना होगा। इसलिए विभाग की ओर से बर्खास्तगी की बात कहे जाने के साथ यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कार्रवाई किस नियम के तहत और किस समयसीमा में की जाएगी।

अब जिला शिक्षा विभाग के सामने दो अहम सवाल हैं—शिक्षक विवेक गुप्ता के मामले में नियमानुसार कार्रवाई कब तक होगी और देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी या नहीं? जिला शिक्षा अधिकारी ने कठोर कार्रवाई का भरोसा दिया है। अब विभाग के अगले कदम से ही स्पष्ट होगा कि यह भरोसा वास्तविक कार्रवाई में बदलता है या मामला आदेश और पत्रों के इंतजार में ही उलझा रहता है।