बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने जल संसाधन विभाग के आठ सेवानिवृत्त कर्मचारियों की बकाया ग्रेच्युटी से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए संबंधित नियंत्रक प्राधिकारी को नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने कहा कि पहले यह तय किया जाए कि ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 इन कर्मचारियों पर लागू होता है या नहीं। इसके लिए दोनों पक्षों को सुनकर कानून के अनुसार आदेश पारित करना होगा।

मामला सुखराम विश्वकर्मा (70), नरेंद्र सिंह कौशिक (64), रामनाथ रात्रे (68), जयप्रकाश उपाध्याय (70), मोहित राम साहू (73), शत्रुहन प्रसाद कौशिक (72), राजकुमार श्रीवास (67) और शत्रुहन लाल श्रीवास (65) से जुड़ा है। सभी याचिकाकर्ता जल संसाधन विभाग में लंबे समय तक सेवा देने के बाद सेवानिवृत्त हुए हैं।

उन्होंने अपने अधिवक्ताओं के माध्यम से हाई कोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं, जिनकी सुनवाई एक साथ की गई।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने विभाग में तीन दशक से अधिक समय तक सेवा दी। सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें ग्रेच्युटी की कुछ राशि का भुगतान किया गया, लेकिन शेष राशि रोक दी गई। इसके बाद उन्होंने ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम के तहत नियंत्रक प्राधिकारी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया।

नियंत्रक प्राधिकारी ने 12 दिसंबर 2025 को विभाग को 30 दिनों के भीतर बकाया ग्रेच्युटी का भुगतान करने का आदेश दिया था। आदेश में भुगतान में देरी होने पर कानून के अनुसार ब्याज देने की बात भी कही गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इसके बावजूद बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता कार्यालय के विधि अधिकारी ने तर्क दिया कि ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 की धारा 2(ई) में ‘कर्मचारी’ की परिभाषा से केंद्र और राज्य सरकार के ऐसे कर्मचारियों को बाहर रखा गया है, जिनकी सेवा पर अलग नियम लागू होते हैं।

सरकार के अनुसार, याचिकाकर्ता राज्य सरकार के कर्मचारी रहे हैं, इसलिए उनके मामलों में नियंत्रक प्राधिकारी को इस अधिनियम के तहत सुनवाई कर आदेश पारित करने का अधिकार नहीं था।

हाई कोर्ट ने इस कानूनी पहलू पर विचार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं के राज्य सरकार के कर्मचारी होने के कारण पहले यह निर्धारित करना जरूरी है कि संबंधित अधिनियम उनके दावों पर लागू होता है या नहीं।

केवल बकाया भुगतान का सवाल ही नहीं, बल्कि आदेश पारित करने वाले प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र की जांच भी आवश्यक है।

कोर्ट ने संबंधित नियंत्रक प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह दोनों पक्षों को सुनने के बाद अधिनियम की प्रयोज्यता और अपने अधिकार क्षेत्र के प्रश्न पर कानून के अनुसार नया आदेश पारित करे। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने सभी याचिकाओं का निराकरण कर दिया।

इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि हाई कोर्ट ने आठों कर्मचारियों की बकाया ग्रेच्युटी की मांग को खारिज कर दिया है या भुगतान का अंतिम आदेश दिया है। अब संबंधित प्राधिकारी को पहले यह तय करना होगा कि ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम के तहत इन मामलों पर विचार करने का अधिकार उसे है या नहीं।