बिलासपुर… छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नागरिकों की निजता और जांच एजेंसियों की शक्तियों की सीमा तय करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने केंद्रीय जांच ब्यूरो की फोन इंटरसेप्शन प्रक्रिया को कानून के अनुरूप नहीं मानते हुए उससे संबंधित आदेशों को निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक के फोन संचार में दखल केवल कानून में निर्धारित असाधारण परिस्थितियों में ही संभव है और वैधानिक प्रक्रिया का अक्षरशः पालन अनिवार्य है।

खंडपीठ ने 28 जून 2025 को जारी CBI के इंटरसेप्शन आदेश, 4 जुलाई 2025 को गृह मंत्रालय की पुष्टि तथा 15 सितंबर 2025 को समीक्षा समिति की कार्यवाही को भी निरस्त कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि इन आदेशों के आधार पर प्राप्त इंटरसेप्ट संदेशों की प्रतियां नष्ट की जाएं और उनका उपयोग जांच या अभियोजन में नहीं किया जाए।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इंटरसेप्शन की अनुमति देते समय सक्षम प्राधिकारी ने उन ठोस और विशिष्ट परिस्थितियों का उल्लेख नहीं किया, जिनके आधार पर किसी नागरिक की निजता में हस्तक्षेप को अपरिहार्य ठहराया जा सके। न्यायालय ने माना कि कानून में निर्धारित ‘सार्वजनिक आपातकाल’ अथवा ‘लोक सुरक्षा’ जैसी अनिवार्य शर्तों का पालन नहीं किया गया। साथ ही आदेशों में स्वतंत्र विचार के बजाय औपचारिक और यांत्रिक प्रक्रिया अपनाई गई।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि बाद में आदेश को पूर्व प्रभाव से वैध ठहराने का प्रयास विधिसम्मत नहीं है। अदालत ने दोहराया कि टेलीफोन इंटरसेप्शन संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित निजता के अधिकार पर गंभीर प्रभाव डालता है, इसलिए इसमें कानून की प्रत्येक शर्त का कठोरता से पालन होना चाहिए।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस निर्णय का अर्थ पूरी आपराधिक कार्यवाही का समाप्त होना नहीं है। विशेष न्यायालय उपलब्ध अन्य स्वतंत्र और वैध साक्ष्यों के आधार पर मुकदमे की सुनवाई जारी रखेगा, लेकिन अवैध रूप से प्राप्त इंटरसेप्ट रिकॉर्ड अभियोजन के साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

यह मामला मेडिकल संस्थानों के निरीक्षण से जुड़े कथित भ्रष्टाचार प्रकरण से संबंधित है, जिसमें श्री रावतपुरा सरकार इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के अध्यक्ष रविशंकर महाराज ने फोन टैपिंग की वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।