Harivasar Vrat 2026: मिथिलांचल में जितिया व्रत का विशेष धार्मिक महत्व है. माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से ये कठिन व्रत रखती हैं. जितिया व्रत में महिलाएं कठोर नियमों का पालन करती हैं और निर्जला उपवास रखकर संतान के लिए प्रार्थना करती हैं. हालांकि, मिथिला में एक और ऐसा व्रत है, जिसे जितिया से भी अधिक कठिन माना जाता है. इस व्रत में कई दिनों तक अन्न और जल का त्याग करना पड़ता है.

Harivasar Vrat 2026/हरिवासर व्रत भगवान विष्णु की आराधना से जुड़ा एक अत्यंत कठिन, दुर्लभ और विशेष धार्मिक व्रत है, जो मुख्य रूप से बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में किया जाता है. ये व्रत जितिया व्रत से भी अधिक कठिन माना जाता है, क्योंकि इसमें कई दिनों तक कठोर नियमों का पालन करना होता है. इस व्रत के दौरान मुख्य रूप से दो दिन और दो रात यानी लगभग 48 घंटे तक पूरी तरह निर्जला (बिना पानी के) रहना होता है.

ये दुर्लभ व्रत हर साल नहीं आता, बल्कि ये विशेष ज्योतिषीय और पंचांग के योग (जैसे कई वर्षों के अंतराल पर) के बनने पर ही किया जाता है. व्रत शुरू होने से एक दिन पहले और व्रत के समाप्त होने के एक दिन बाद केवल एक बार ही भोजन (एक भुक्त) करने का विधान है. सामान्य धर्मशास्त्रों में द्वादशी तिथि के पहली एक-चौथाई अवधि को भी ‘हरिवासर’ कहा जाता है, जिसमें एकादशी व्रत का पारण (व्रत खोलना) करना वर्जित माना गया है.

इस साल ये 12 सालों बाद यह योग बना रहा है. नाम से ही स्पष्ट है कि हरि का उपवास इसमें भगवान विष्णु, शिव और पार्वती की विशेष पूजा की जाती हैं. इस बार 2026 में 21 सितंबर से शुरू होकर 24 सितंबर तक व्रत का शुभ दिन है. ये व्रत सबसे कठिन है. इसे जितिया से भी ज्यादा मुश्किल बताया जाता है और कहा गया है कि इसमें चार दिन तक बिना खाना-पानी के रहना होता है यानी निर्जला व्रत होता है.

हरिवासर द्वादशी तिथि के पहले चतुर्थ भाग (लगभग 4 से 5 घंटे या पंचांग अनुसार गणना) तक रहता है.

एकादशी व्रत का पारण कभी भी हरिवासर के दौरान नहीं किया जाना चाहिए, इससे व्रत का फल नष्ट हो सकता है.

मिथिलांचल क्षेत्र में हरिवासर योग या व्रत को अत्यधिक दुर्लभ और कठिन माना जाता है, जिसमें नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता है.

द्वादशी के दिन प्रातः काल स्नान के बाद भगवान विष्णु की पूजा और जप किया जाता है.

पंचांग देखकर ये सुनिश्चित किया जाता है कि हरिवासर का समय समाप्त हो गया है या नहीं.

हरिवासर बीत जाने के बाद ही सूर्योदय के बाद या सुबह के समय सात्विक चीजों (जैसे चरणामृत, तुलसी और अन्न-जल) से व्रत का पारण किया जाता है. मध्याह्न (दोपहर 11 से 1 बजे के बीच) व्रत खोलने से बचना चाहिए.

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. cgwall इसकी पुष्टि नहीं करता है.