बिलासपुर…मुंगेली नाका स्थित ग्रीन गार्डन मैदान में कांग्रेस द्वारा आयोजित विशाल आमसभा “वोट चोर,गद्दी छोड़” में प्रदेश के बड़े कांग्रेसी नेताओं ने हिस्सा लिया।

सचिन पायलट, भूपेश बघेल, उपमुख्यमंत्री टी एस. सिंहदेव, विजय जांगिड़, अटल श्रीवास्तव, डॉ. शिव डहरिया, सत्यनारायण शर्मा, रविंद्र चौबे, धनेंद्र साहू समेत कई वरिष्ठ नेता एक ही वाहन से कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे। वाहन ड्राइव करने की जिम्मेदारी खुद कांग्रेस के राष्ट्रीय महामंत्री  सचिन पायलट ने संभाला।  बावजूद इसके कार्यक्रम में व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठे।

मंच से नेताओं ने चुनावी हार का मुख्य कारण “वोट की चोरी” को बताया। नेताओं ने आरोप लगाया कि राज्य से लेकर केंद्र तक चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ियों के चलते पार्टी को करारी हार झेलनी पड़ी। भाषणों के दौरान नेताओं ने अपने ही नेताओं के बयानों पर जमकर कटाक्ष किया।

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव के महासमुंद में दिए गए हालिया बयान पर निशाना साधा। जबकि डॉ. शिव डहरिया ने नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत के बयान का जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस में कोई चम्मच नहीं है, पार्टी के नेता और कार्यकर्ता ही उसकी ताकत हैं। इन बयानों ने पार्टी में मतभेद और अंदरूनी असहमति की तस्वीर साफ कर दी।

कार्यक्रम में सबसे अधिक चर्चा उस समय बनी जब मंच पर आदिवासी नेता अमरजीत भगत का सार्वजनिक अपमान हुआ। वे भाषण दे रहे थे तभी सचिन पायलट का काफिला कार्यक्रम स्थल पहुंचा । पायलट के पहुंचते ही मंच पर अफरा-तफरी मच गई। इसी बीच मंच पर बैठे एक नेता ने माइक छीन लिया और सचिन पायलट ज़िंदाबाद के नारे लगाने लगे। मौजूद लोगों ने इसे आदिवासी नेता का खुला अपमान करार दिया। यह घटना पूरे कार्यक्रम में चर्चा का विषय बनी रही।

इसके अलावा आयोजन स्थल पर बुनियादी व्यवस्थाओं की कमी ने असंतोष बढ़ाया। पानी जैसी आवश्यक सुविधाओं के लिए लोगों को भटकते देखा गया। पत्रकारों और आम नागरिकों ने भी नाराजगी जताई। हालांकि बाद में सभी की नाराजगी को दूर कर किया गया मतलब समझाइस देकर माहौल को शांत कराया गया ।

यह आमसभा राजनीतिक संदेश देने का मंच तो बनी, लेकिन नेताओं के आपसी मतभेद, अनुशासन की कमी और व्यवस्था में ढिलाई ने कांग्रेस की छवि को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। यह साफ दिखा कि संगठनात्मक तैयारी की कमी बड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद कार्यक्रम को सुचारु रूप नहीं दे सकी।

अब सवाल यही है — क्या कांग्रेस हार की जिम्मेदारी स्वीकार कर आत्ममंथन करेगी या ऐसे आयोजन केवल राजनीतिक नारों तक सीमित रहेंगे? पार्टी के लिए यह समय आत्मविश्लेषण का है, क्योंकि जनता की उम्मीदें और नेतृत्व की विश्वसनीयता सीधे तौर पर इन आयोजनों की व्यवस्था और अनुशासन पर निर्भर करती है।