बिलासपुर (मनीष जायसवाल)।23 सितंबर को भाजपा ने देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए अपने प्रभारियों और सह प्रभारियों की नई सूची जारी की। छत्तीसगढ़ में स्मृति ईरानी को प्रभारी और सिद्धार्थ शंभू को सह प्रभारी बनाया गया। इसी सूची में छत्तीसगढ़ की आदिवासी महिला नेता गोमती साय को गुजरात का सह प्रभारी बनाया गया। पहली नजर में यह पार्टी के भीतर जिम्मेदारियों का बंटवारा है। छत्तीसगढ़ के हिसाब से देखें तो इसके साथ महिला नेतृत्व को लेकर एक नई चर्चा भी शुरू हो गई।

स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ के साथ हरियाणा का भी प्रभार मिला है। गुजरात में तरुण चुघ प्रभारी हैं और अजय महावर के साथ गोमती साय को सह प्रभारी बनाया गया है। गोमती साय पहले सांसद रह चुकी हैं और अब छत्तीसगढ़ विधानसभा की सदस्य हैं। छत्तीसगढ़ की एक आदिवासी महिला नेता को दूसरे राज्य की राजनीति में काम करने की जिम्मेदारी मिलना उनके राजनीतिक दायरे के बढ़ने के रूप में देखा जा सकता है। इसे मुख्यमंत्री पद का संकेत मानने का अभी कोई आधार नहीं है। फिर भी इस नियुक्ति ने महिला और आदिवासी नेतृत्व को लेकर चल रही बात को एक नया सिरा दे दिया है।

इसके अगले ही दिन 24 सितंबर को छत्तीसगढ़ भाजपा में एक और बड़ा बदलाव हुआ। प्रदेश महामंत्री संगठन की जिम्मेदारी पवन साय से लेकर कर्मवीर सिंह को दी गई। पवन साय को झारखंड भेजा गया। यानी 23 सितंबर को प्रदेश प्रभारी बदले और 24 सितंबर को प्रदेश संगठन महामंत्री। दो दिन में भाजपा के प्रदेश ढांचे में दो नए चेहरे आ गए।

स्मृति ईरानी और कर्मवीर सिंह का काम एक जैसा नहीं है। प्रदेश प्रभारी राजनीतिक और संगठनात्मक मामलों में राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रदेश इकाई के बीच कड़ी का काम करते हैं। संगठन महामंत्री की भूमिका पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं और संगठन की मशीनरी से जुड़ी रहती है। दोनों नियुक्तियां एक साथ हुई हैं, इसलिए इन्हें अलग-अलग घटना मानकर छोड़ देना भी आसान नहीं है।

इतनी जल्दी हुए बदलाव के पीछे क्या है, इसका जवाब भाजपा ने सार्वजनिक रूप से नहीं दिया है। पवन साय लंबे समय से छत्तीसगढ़ संगठन में रहे हैं। ऐसे में यह संभावना जरूर हो सकती है कि प्रदेश की जमीनी स्थिति, कार्यकर्ताओं की हलचल और आने वाले समय की जरूरतों को लेकर उनकी रिपोर्ट ऊपर तक गई हो। इसका कोई सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है, इसलिए इसे तय बात कहना ठीक नहीं होगा। संगठन में लंबे समय तक काम करने वाले व्यक्ति की राय ऐसे फैसलों में कितनी जगह रखती है, यह पार्टी के भीतर की बात है।

इस पूरे घटनाक्रम में नितिन नबीन का नाम भी ध्यान खींचता है। वे छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रह चुके हैं और अब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। छत्तीसगढ़ की राजनीति और यहां के संगठन से उनका पुराना परिचय है। ऐसे में प्रदेश में बदलाव का फैसला ऐसे नेतृत्व के समय हो रहा है, जिसने इस राज्य को नजदीक से देखा है। स्मृति ईरानी और कर्मवीर सिंह की नियुक्ति को इसी पृष्ठभूमि में पढ़ने वाले लोग इसे महज सामान्य फेरबदल से कुछ अलग मान रहे हैं।

हो सकता है बात मुख्यमंत्री बदलने की न हो..। हो सकता है बात संगठन को नए सिरे से जमाने की हो..। कौन कहां काम करेगा, कार्यकर्ताओं की सुनवाई कैसी होगी, सरकार और पार्टी के बीच तालमेल किस तरह चलेगा और आने वाले चुनावों के लिए प्रदेश इकाई को किस ढंग से तैयार किया जाएगा, इन बातों पर राष्ट्रीय नेतृत्व ने अपने हिसाब से कुछ तय किया हो..। अंदर की बात बाहर नहीं है। 23 और 24 सितंबर के फैसले इतना जरूर बताते हैं कि भाजपा ने छत्तीसगढ़ में अपने संगठन के कामकाज को लेकर कुछ बदलाव किए हैं।

इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 13 अप्रैल 2026 की बात को भी लोग जोड़कर देख रहे हैं। नई दिल्ली में नारी शक्ति वंदन सम्मेलन में उन्होंने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी का उल्लेख किया था। पंचायतों में काम कर रही बड़ी संख्या में महिलाओं और कई राज्यों में करीब 50 प्रतिशत भागीदारी की बात रखते हुए उन्होंने महिलाओं को आगे बड़ी जिम्मेदारियां मिलने की बात कही थी।

यह मुख्यमंत्री पद की घोषणा नहीं थी। इसे उस रूप में पढ़ना भी ठीक नहीं होगा। फिर भी भाजपा की राजनीति में महिला नेतृत्व को लेकर चल रही दिशा को समझने में यह बात एक संदर्भ जरूर देती है। सितंबर 2023 में संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया था। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान इसमें रखा गया। पंचायतों से लेकर विधानसभा और पार्टी के भीतर तक महिलाओं की भूमिका बढ़ाने की कोशिशें अलग-अलग स्तर पर दिखाई दे रही हैं।

छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन योजना इस पूरी राजनीति का एक बड़ा हिस्सा है। 2026-27 के बजट में योजना के लिए 8,200 करोड़ रुपये रखे गए हैं। हर महीने महिलाओं के खातों में राशि पहुंचती है। सरकार और महिलाओं के बीच सीधा संपर्क बनाने वाली यह योजना पहले से चल रही है। अब पार्टी के भीतर भी महिलाओं को अलग-अलग जगहों पर नई जिम्मेदारियां मिल रही हैं।

दूसरी तरफ आदिवासी नेतृत्व को लेकर भाजपा छत्तीसगढ़ में अपना फैसला पहले ही कर चुकी है। 2023 के विधानसभा चुनाव में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 29 सीटों में भाजपा ने 17 सीटें जीती थीं। इसके बाद विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री बनाया गया। यानी आदिवासी नेता को सत्ता के सबसे ऊंचे पद तक पहुंचाने का फैसला छत्तीसगढ़ में हो चुका है। अब जो नई बात सामने आती है, वह आदिवासी नेतृत्व के साथ महिला नेतृत्व का मेल है।

यहीं से आदिवासी महिला मुख्यमंत्री की संभावना वाली बात निकलती है। छत्तीसगढ़ भाजपा में इसके लिए कई महिला चेहरे हैं। रेणुका सिंह केंद्र सरकार में मंत्री रह चुकी हैं और अब विधानसभा में हैं। लता उसेंडी विधानसभा के साथ पार्टी संगठन में भी काम कर चुकी है पूर्व मंत्री भी रह चुकी है। रायमुनि भगत जशपुर से विधायक हैं। गोमती साय सांसद रहने के बाद विधायक बनीं और अब गुजरात भाजपा के संगठन में जिम्मेदारी संभालेंगी। इनमें से किसी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बताया नहीं गया है। भाजपा की ओर से ऐसा कोई ऐलान भी नहीं हुआ है।

फिर भी घटनाओं को एक साथ रखकर देखने पर बात आगे बढ़ती है। एक तरफ आदिवासी मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय हैं। दूसरी तरफ महतारी वंदन के जरिए महिलाओं से सरकार का सीधा जुड़ाव है। प्रधानमंत्री महिला नेतृत्व को आगे बड़ी जिम्मेदारियां देने की बात कर चुके हैं। पार्टी ने स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया है। कर्मवीर सिंह को संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी दी गई है। गोमती साय को गुजरात भेजा गया है। इन सबको जोड़कर देखने पर यह बात उठना स्वाभाविक है कि क्या भाजपा छत्तीसगढ़ में महिला नेतृत्व को सत्ता के शीर्ष तक ले जाने की जमीन तैयार कर रही है।

अगर इसमें आदिवासी पहचान भी जुड़ती है तो बात और बड़ी हो जाती है। देश के कई राज्यों में आदिवासी नेता मुख्यमंत्री रहे हैं। शिबू सोरेन, हेमंत सोरेन, जोरा मथंगा, पेमा खांडू और विष्णुदेव साय इसके उदाहरण हैं। राज्य की मुख्यमंत्री की कुर्सी तक अब तक किसी आदिवासी महिला के पहुंचने का उदाहरण सामने नहीं आया है। आदिवासी महिला नेतृत्व देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक जरूर पहुंच चुका है। द्रौपदी मुर्मु राष्ट्रपति बनीं। ऐसे में किसी राज्य में आदिवासी महिला को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला देश की राजनीति में अलग जगह बनाएगा।

अब इस पूरी बात में नवरात्रि की तारीखें भी जुड़ रही हैं। शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू होगी और 20 अक्टूबर को विजयादशमी है। 19 अक्टूबर नवरात्रि का आखिरी दिन होगा। अगर इसी दौरान भाजपा महिला नेतृत्व को लेकर कोई बड़ा फैसला करती है तो उसका राजनीतिक संदेश अलग निकलेगा। शक्ति के पर्व में किसी महिला को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने का फैसला देशभर में चर्चा का कारण बन सकता है।

इसी वजह से 19 अक्टूबर की तारीख पर निगाह टिक गई है। अगर तब तक मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई फैसला नहीं आता तो 2028 के विधानसभा चुनाव तक समय और घटेगा। नए मुख्यमंत्री को सरकार चलाने के साथ अपनी राजनीतिक जमीन बनाने के लिए भी समय चाहिए। ऐसे में फैसला जितना आगे खिसकेगा, उसकी अपनी राजनीतिक गणित भी होगी। यह भी सच है कि भाजपा चुनाव से पहले राज्यों में मुख्यमंत्री बदलने के फैसले ले चुकी है। इसलिए इस संभावना को अभी पूरी तरह बंद मानना भी ठीक नहीं होगा।

19 अक्टूबर के बाद अगर मुख्यमंत्री बदलने की बात आगे नहीं बढ़ती है तो नजर मंत्रिमंडल में बदलाव पर जा सकती है। पिछले कुछ समय से मंत्रिमंडल में फेरबदल की बातें राजनीतिक गलियारों में चल रही हैं। सरकार या भाजपा की तरफ से इस पर कोई घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में अगला बदलाव सत्ता के शीर्ष पर होगा या मंत्रियों और संगठन के स्तर पर, यह आने वाला समय बताएगा।

23 सितंबर की सूची और 24 सितंबर का संगठनात्मक बदलाव अपने आप में मुख्यमंत्री बदलने का प्रमाण नहीं हैं। पार्टी की नियुक्तियों का अपना हिसाब होता है और मुख्यमंत्री का फैसला अलग स्तर पर होता है। अभी भाजपा ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री बदलने की तैयारी चल रही है। यह भी हो सकता है कि सरकार के कामकाज और पार्टी संगठन की समीक्षा के बाद राष्ट्रीय नेतृत्व ने संगठन में नई टीम लगाने का फैसला किया हो। पवन साय को झारखंड भेजना और कर्मवीर सिंह को छत्तीसगढ़ लाना उसी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।

फिर भी राजनीति में हर बात आदेश के साथ सामने नहीं आती। कई बार पहले लोग बदलते हैं, फिर उनकी भूमिका से संकेत मिलने लगते हैं। इस समय छत्तीसगढ़ भाजपा में प्रदेश प्रभारी बदला है, संगठन महामंत्री बदला है और एक आदिवासी महिला नेता को दूसरे राज्य में संगठन की जिम्मेदारी मिली है। सरकार में महिला केंद्रित योजना पहले से चल रही है और मुख्यमंत्री के रूप में आदिवासी नेतृत्व मौजूद है। इसलिए इन घटनाओं को जोड़कर देखने वालों के पास चर्चा का आधार जरूर है।

23 सितंबर से 19 अक्टूबर तक अब यही देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा की नई टीम किस दिशा में काम करती है। क्या मामला संगठन को कसने तक रहेगा, क्या मंत्रिमंडल में फेरबदल होगा या सत्ता के शीर्ष पर भी कोई बड़ा फैसला सामने आएगा। अभी किसी एक बात पर मुहर नहीं लगी है। मगर स्मृति ईरानी की छत्तीसगढ़ में एंट्री, कर्मवीर सिंह को संगठन की कमान और गोमती साय को गुजरात की जिम्मेदारी मिलने के बाद एक सवाल जरूर खड़ा हो गया है..! क्या छत्तीसगढ़ में पहली बार किसी आदिवासी महिला को मुख्यमंत्री बनाने की जमीन तैयार की जा रही है, या भाजपा फिलहाल संगठन की अपनी जमीन ही दुरुस्त कर रही है..?