बिलासपुर: (मनीष जायसवाल )सेवारत शिक्षकों के बीच TET परीक्षा पास करना अब उनके भविष्य को लेकर एक बड़ा मुद्दा बन गया है। शिक्षक पढ़ाई करे, बच्चों को पढ़ाए या स्कूल के दूसरे काम पूरे करे, इसी कशमकश में है। ऊपर से TET की तैयारी और परीक्षा का स्तर भी आसान नहीं है। ऐसे में स्कूल शिक्षा विभाग और शासन की ओर से इस मामले में निर्णय लेने में हो रही देरी शिक्षकों की परेशानी बढ़ा रही है।

इस विषय पर अपनी बात रखते हुए शिक्षक नेता रंजीत बनर्जी कहते है कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को TET परीक्षा आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। तमिलनाडु सहित कुछ अन्य राज्य इस प्रक्रिया में आगे बढ़ चुके हैं। वहीं छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में सेवारत शिक्षकों की TET अनिवार्यता से जुड़े मामले सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग स्तर पर विचाराधीन हैं।

रंजीत बनर्जी बताते हैं कि समय तेजी से निकल रहा है। 2028 आने में अब बहुत कम समय बचा है। ऐसी स्थिति में जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कुछ राज्य सेवारत शिक्षकों के लिए अलग TET आयोजित कर रहे हैं और कुछ राज्य इसकी प्रक्रिया में लगे हैं, तब छत्तीसगढ़ में भी सेवारत शिक्षकों के लिए अलग विभागीय या विशेष TET की व्यवस्था की जा सकती है। इसके लिए तमिलनाडु का Working Teachers TET एक उपयोगी मॉडल हो सकता है। हालांकि छत्तीसगढ़ की परिस्थितियां तमिलनाडु से अलग हैं, इसलिए वहां की व्यवस्था को ज्यों का त्यों लागू करने के बजाय राज्य की अपनी शिक्षक सेवा संरचना और अलग-अलग समय में सेवा में आए शिक्षकों की योग्यता और पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर नियम बनाए जा सकते हैं।

रंजीत बनर्जी का कहना है कि स्कूल शिक्षा विभाग को यह भी ध्यान रखना होगा कि छत्तीसगढ़ में शिक्षक संवर्ग का इतिहास सामान्य भर्ती व्यवस्था जैसा नहीं रहा है। प्रदेश में बड़ी संख्या में पूर्व से नियमित शिक्षक रहे हैं। इसके बाद अलग-अलग समय में गारंटी गुरुजी, संविदा शिक्षक, शिक्षा कर्मी और अन्य व्यवस्थाओं के माध्यम से शिक्षक नियुक्त होते रहे। बाद में शिक्षा कर्मियों का नियमित शिक्षा कर्मी के रूप में बदलाव हुआ और वर्ष 2018 में संविलियन के बाद बड़ी संख्या में शिक्षक नियमित शिक्षक संवर्ग का हिस्सा बने।

इन शिक्षकों की नियुक्ति एक ही समय, एक ही प्रक्रिया और एक जैसी सेवा शर्तों के तहत नहीं हुई है। मध्यप्रदेश के समय से लेकर छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद भी लंबे समय तक शिक्षक नियुक्तियां ऐसी व्यवस्थाओं के तहत होती रहीं, जब TET नियुक्ति की अनिवार्य शर्त नहीं थी। कई शिक्षकों ने शिक्षक के रूप में अपनी सेवा एक अलग संवर्ग से शुरू की और समय के साथ अलग-अलग सरकारी निर्णयों के माध्यम से उनका संवर्ग और सेवा स्वरूप बदलता गया। वर्ष 2018 में शिक्षा कर्मियों का संविलियन भी इसी लंबे सेवा इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी रहा। ऐसे में आज सभी सेवारत शिक्षकों को एक ही पैमाने पर देखना व्यावहारिक नहीं होगा। विशेष रूप से उन शिक्षकों के मामले में, जिन्होंने अपनी पूरी शैक्षणिक और व्यावसायिक यात्रा राज्य की अलग-अलग शिक्षक व्यवस्थाओं में रहते हुए पूरी की है।

 

रंजीत बनर्जी बताते हैं कि तमिलनाडु ने 2026 में पहले से स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के लिए अलग Teacher Eligibility Test for Working Teachers आयोजित किया। इसके लिए अलग अधिसूचना जारी हुई, अलग आवेदन प्रक्रिया हुई और जुलाई 2026 में Paper-I तथा Paper-II की परीक्षा भी आयोजित की गई। इससे यह रास्ता सामने आता है कि TET की अनिवार्यता को बनाए रखते हुए सेवारत शिक्षकों के लिए अलग परीक्षा व्यवस्था बनाई जा सकती है।

उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ भी इसी विचार को अपनी परिस्थितियों के अनुसार लागू कर सकता है। यहां विभागीय TET का स्वरूप तैयार करते समय शिक्षक की वर्तमान पदस्थापना के साथ उसकी पहली नियुक्ति, सेवा में प्रवेश का माध्यम और सेवा की निरंतरता को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम और परीक्षा की व्यवस्था बनाई जा सकती है।

शिक्षक नेता प्रदीप पांडे कहते हैं कि प्राथमिक स्तर पर पढ़ाने वाले सहायक शिक्षकों तथा कक्षा छठवीं से आठवीं तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए उनकी जिम्मेदारी और विषय के अनुरूप व्यवस्था की जा सकती है। सेवारत शिक्षकों को पर्याप्त अवसर देने के लिए यह परीक्षा साल में तीन बार आयोजित करने पर भी विचार किया जा सकता है। परीक्षा का स्तर तय करते समय यह ध्यान रखना जरूरी होगा कि अभ्यर्थी कोई नया प्रतियोगी नहीं है, बल्कि वह पहले से स्कूल में अध्यापन कर रहा शिक्षक है।

प्रदीप के अनुसार सरकार पुराने संवर्गों से नियुक्त शिक्षकों के लिए अलग पात्रता मानदंड, पर्याप्त अवसर और संक्रमणकालीन व्यवस्था भी बना सकती है। इसका उद्देश्य किसी शिक्षक को TET से स्थाई छूट देना नहीं होगा। उद्देश्य यह होगा कि पहले से सेवा में मौजूद शिक्षकों को TET की पात्रता हासिल करने का व्यावहारिक और अलग रास्ता उपलब्ध हो।

रंजीत बनर्जी बताते हैं कि पदोन्नति को फिलहाल TET के साथ जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है। पदोन्नति एक अलग विभागीय प्रक्रिया है। पद उपलब्ध होने, वरिष्ठता, सेवा अवधि और लागू विभागीय नियमों के आधार पर पदोन्नति की जा सकती है। पदोन्नति एक साल बाद भी हो सकती है, लेकिन TET की पात्रता पूरी करने के लिए सेवारत शिक्षकों को अलग अवसर देना जरूरी है।

रंजीत बनर्जी कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के सामने दो रास्ते हो सकते हैं। पहला, तमिलनाडु के Working Teachers TET को आधार बनाकर उसी तरह से सेवारत शिक्षकों के लिए अलग परीक्षा आयोजित की जाए। दूसरा, राज्य की अपनी परिस्थितियों को देखते हुए उससे बेहतर और अधिक व्यावहारिक छत्तीसगढ़ सेवारत शिक्षक TET का मॉडल तैयार किया जाए।

शिक्षकों का कहना है कि शिक्षक पढ़ेगा, पढ़ाएगा या स्कूल के दूसरे काम करेगा, यह स्थिति लंबे समय तक नहीं चल सकती। रास्ता TET से बचने का नहीं, TET की अनिवार्यता को सेवारत शिक्षकों की वास्तविक सेवा परिस्थितियों के अनुरूप लागू करने का होना चाहिए। तमिलनाडु ने Working Teachers TET के जरिए एक रास्ता दिखाया है। छत्तीसगढ़ उस रास्ते से आगे बढ़कर अपनी परिस्थितियों के अनुरूप विभागीय TET का अपना मॉडल तैयार कर सकता है। इसके लिए राज्य सरकार को सेवारत शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में समय रहते निर्णय लेना चाहिए।