रायपुर| 27 अक्टूबर 2026| छत्तीसगढ़ की राजनीति में राजधानी रायपुर के पार्टी मुख्यालय में प्रदेश भाजपा प्रभारी स्मृति ईरानी के दौरे ने तमाम जिलों में बैठे भारतीय जनता पार्टी के जिला अध्यक्षों और संगठन के बड़े चेहरों की नींद उड़ा दी है। जब रायपुर में नेताओं के दौरों की पोल खोल दी गई है, तब जिले की रिपोर्ट भी प्रदेश प्रभारी तक पहुंचेगी ही, यह बात जिला अध्यक्षों को भी समझ में आ गई है।

रायपुर। प्रदेश भाजपा की नई प्रभारी स्मृति ईरानी के आगमन और उनके द्वारा चलाए गए कड़े राजनीतिक ‘हंटर’ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता में होने का मतलब आराम या विश्राम नहीं होता। अब सवाल यह उठ रहा है कि छत्तीसगढ़ में खुद भाजपा की सरकार होने के बावजूद पार्टी को इस आक्रामक, कैडर-बेस्ड और जमीनी कार्यशैली की अचानक इतनी सख्त जरूरत क्यों महसूस हुई? क्या अब जिला अध्यक्षों को भी अपनी कार्यशैली बदलनी होगी?

अब तक की कार्यशैली और नया बदलाव

छत्तीसगढ़ में लंबे समय से भाजपा जिला अध्यक्षों और स्थानीय पदाधिकारियों की कार्यशैली काफी हद तक पारंपरिक और औपचारिक रही है। अब तक का ढर्रा यह था कि जिला अध्यक्ष बैठकों में शामिल हो गए, सरकारी और पार्टी के बड़े आयोजनों में नेताओं के स्वागत-सत्कार में तस्वीरें खिंचवा लीं, और कागजी रिपोर्ट ऊपर भेज दी। लेकिन स्मृति ईरानी के आने के बाद इस कार्यशैली में जमीन-आसमान का अंतर आ गया है। अब केवल कागजी आंकड़े और मेल-मिलाप की राजनीति नहीं चलेगी। नए बदलाव के तहत जिला अध्यक्षों को अपने-अपने जिलों के हर कोने में जाकर यह सुनिश्चित करना होगा कि संगठन जमीन पर कितना असरदार है। अब एसी कमरों में बैठकर आदेश चलाने के बजाय बूथ स्तर तक पैदल चलना और जनता की नब्ज टटोलना अनिवार्य कर दिया गया है।

बदलाव की आवश्यकता क्यों? सत्ता के अहंकार और कार्यकर्ताओं की अनदेखी पर प्रहार

सवाल उठता है कि जब छत्तीसगढ़ में अपनी खुद की भाजपा सरकार है, तो फिर इस तरह की आक्रामक और सख्त कार्यशैली की आवश्यकता क्यों पड़ी? दरअसल, सरकार बनने के बाद पार्टी के भीतर एक बड़ी कमजोरी यह देखी जा रही थी कि कई जनप्रतिनिधि और जिला स्तर के नेता सत्ता के अहंकार या वीआईपी कल्चर में डूबकर आम कार्यकर्ताओं और जनता से कट गए थे। आम कार्यकर्ताओं की यह लगातार शिकायत थी कि सरकार आने के बाद भी उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। इस बढ़ती दूरी और सुस्ती ने संगठन की पकड़ को कमजोर करना शुरू कर दिया था। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने समय रहते भांप लिया कि यदि इस लीपापोती को नहीं रोका गया, तो आने वाले समय में यह पार्टी के लिए भारी पड़ सकता है। यही कारण है कि व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए यह कड़ा रुख अपनाया गया है।

सत्ता में रहते हुए भी जिला अध्यक्षों को क्यों रहना होगा ‘फाइट मोड’ में?

आमतौर पर यह माना जाता है कि पार्टी जब सत्ता में होती है, तो संगठन के नेताओं के लिए काम करना आसान हो जाता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के संदर्भ में अब समीकरण बिल्कुल उल्टे हो चुके हैं। भाजपा जिला अध्यक्षों के लिए अब काम करना पहले से कहीं अधिक कठिन और चुनौतीभरा हो गया है। सत्ता में होने के बावजूद उन्हें प्रशासनिक समन्वय, जनता की अपेक्षाओं और संगठन के कड़े अनुशासन के बीच संतुलन बिठाना पड़ रहा है। जिला अध्यक्षों को अब केवल सरकारी योजनाओं के प्रचार- प्रसार तक सीमित नहीं रहना है, बल्कि यह भी साबित करना है कि वे जनता और सरकार के बीच एक मजबूत सेतु हैं। यदि किसी जिले में अध्यक्ष सुस्त पाए गए, तो उन्हें सीधे तौर पर गाज गिरने का डर सता रहा है।

बूथ तक जाने का फरमान और जिला अध्यक्षों की अग्निपरीक्षा

स्मृति ईरानी द्वारा बार-बार भाजपा नेताओं को ‘बूथ स्तर तक जाने’ के निर्देश दिए जाने के पीछे एक बहुत बड़ी राजनीतिक रणनीति है। चुनाव सिर्फ बड़े नेताओं के चेहरे पर नहीं, बल्कि बूथ की मजबूती पर जीते जाते हैं। इस पूरी व्यवस्था में जिला अध्यक्षों की भूमिका अब सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। जिला अध्यक्षों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे केवल शहरी बैठकों तक सीमित न रहें, बल्कि ग्रामीण और सुदूर बूथों तक पहुंचकर कमेटियों को सक्रिय करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रमों (जैसे ‘मन की बात’) को जन-जन तक पहुँचाना और बूथ की हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान करना अब जिला अध्यक्षों के रिपोर्ट कार्ड के मुख्य अंक तय करेगा।

खड़गे के बयान पर भाजयुमो की आक्रामक सक्रियता: क्या संकेत देता है संगठन का नया तेवर?

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिताजी पर जिस तरह का आपत्तिजनक बयान सामने आया, उसके बाद एक दिन पहले देश व छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) और पार्टी कार्यकर्ताओं ने जिस आक्रामक तरीके से सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया, वह भाजपा के संगठनात्मक चरित्र के एक नए पहलू को उजागर करता है। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि भाजपा अपने वैचारिक और राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ किसी भी तरह की नरमी दिखाने के मूड में नहीं है। पार्टी अब रक्षात्मक राजनीति छोड़कर पूरी तरह से आक्रामक और आन्दोलनात्मक तेवर अपना चुकी है। यह घटना यह बताती है कि संगठन केवल चुनावी मशीनरी नहीं है, बल्कि वैचारिक रूप से हर मोर्चे पर डटकर मुकाबला करने के लिए कैडर को हमेशा ‘अलर्ट मोड’ में रखना ही नई कार्यशैली का मूल मंत्र है।