DA Update: पश्चिम बंगाल के 20 लाख कर्मचारियों को मिलेगा 2008 से बकाया महंगाई भत्ता, भुगतान के लिए विशेष कमेटी गठित
अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि महंगाई भत्ता कोई अतिरिक्त लाभ या 'बोनस' नहीं है, बल्कि यह बढ़ती महंगाई के प्रतिकूल प्रभावों से कर्मचारियों की वास्तविक आय को बचाने का एक आवश्यक साधन है।

DA Update/दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के करीब 20 लाख सरकारी कर्मचारियों के पक्ष में एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह अपने कर्मचारियों को वर्ष 2008 से 2019 तक का बकाया महंगाई भत्ता (डीए) प्रदान करे। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि महंगाई भत्ता प्राप्त करना कर्मचारियों का एक वैध और कानूनी अधिकार है, जिसे राज्य सरकार अपनी मर्जी से संशोधित या रोक नहीं सकती। कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार को आदेश दिया है कि वह 6 मार्च तक बकाया डीए का 25 प्रतिशत भुगतान सुनिश्चित करे। इस फैसले से उन लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को बड़ी राहत मिली है, जो लंबे समय से अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।
अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि महंगाई भत्ता कोई अतिरिक्त लाभ या ‘बोनस’ नहीं है, बल्कि यह बढ़ती महंगाई के प्रतिकूल प्रभावों से कर्मचारियों की वास्तविक आय को बचाने का एक आवश्यक साधन है।
पीठ ने कहा कि एक बार जब वैधानिक नियमों के तहत महंगाई भत्ते को अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जोड़ दिया जाता है, तो राज्य सरकार बाद में किसी कार्यालय ज्ञापन के जरिए इसकी गणना के तरीके को नहीं बदल सकती। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि इस फैसले का लाभ उन कर्मचारियों को भी मिलेगा जो मुकदमे के लंबित रहने के दौरान सेवानिवृत्त (रिटायर) हो चुके हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारियों को साल में दो बार महंगाई भत्ता पाने का स्वत: अधिकार नहीं है।
इस विशाल भुगतान प्रक्रिया की जटिलता और वित्तीय भार को देखते हुए, उच्चतम न्यायालय ने एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा, उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान, न्यायमूर्ति गौतम भादुरी और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा नामित एक वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे।
यह समिति राज्य सरकार के साथ मिलकर भुगतान की जाने वाली कुल राशि का निर्धारण करेगी और भुगतान के लिए एक समय सारणी (शेड्यूल) तैयार करेगी। अनुमान के मुताबिक, कुल बकाया राशि लगभग 41,000 करोड़ रुपये है। समिति के निर्णय के आधार पर पहली किस्त का भुगतान 31 मार्च, 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
यह विवाद तब शुरू हुआ था जब पश्चिम बंगाल सरकार के कर्मचारियों ने केंद्र सरकार के समान दर पर डीए की मांग को लेकर कलकत्ता उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। मई 2022 में उच्च न्यायालय ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे राज्य सरकार ने नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, जहां केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 55 प्रतिशत डीए मिल रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों को हालिया बढ़ोतरी के बाद भी केवल 18 प्रतिशत ही मिल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अब राज्य सरकार को पहली किस्त के भुगतान के बाद स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है और मामले की अगली सुनवाई 15 अप्रैल के लिए तय की है।





