कागजों के स्कूलों पर कोर्ट का कोड़ा: 2 दिन में हिसाब दो, वरना मान्यता खत्म
बिना भवन चल रहे निजी स्कूलों पर कार्रवाई तय, हाईकोर्ट की सख्ती के बाद शिक्षा विभाग अलर्ट—अफसरों की भूमिका भी जांच के घेरे में

नवा रायपुर/बिलासपुर …छत्तीसगढ़ में शिक्षा के नाम पर खड़े “कागजी स्कूलों” का सच अब परत-दर-परत खुलने लगा है। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद लोक शिक्षण संचालनालय ने पूरे प्रदेश में बिना भवन संचालित निजी स्कूलों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। साफ संदेश दिया गया है—नियमों के बिना चल रहे स्कूल अब बच नहीं पाएंगे।
प्रदेश में निजी स्कूलों की मान्यता के लिए भवन होना अनिवार्य शर्त है, लेकिन जमीनी तस्वीर इससे उलट नजर आती है। शहरों से लेकर गांवों तक ऐसे कई स्कूल चल रहे हैं, जहां न पर्याप्त कमरे हैं, न पीने के पानी की व्यवस्था और न ही शौचालय या खेल का मैदान। कई जगह किराए की दुकानों, खेतों और अस्थायी ढांचों में स्कूल संचालित हो रहे हैं, जबकि कागजों में उन्हें पूरी मान्यता हासिल है। यह स्थिति न सिर्फ नियमों की अनदेखी है, बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ सीधा खिलवाड़ भी है।
इस पूरे मामले ने तब गंभीर रूप लिया जब 24 मार्च 2026 को W.P.I.L. No. 22/2016 पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया। कोर्ट की सख्ती के बाद अब लोक शिक्षण संचालनालय ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को आपात निर्देश जारी करते हुए 2 अप्रैल तक ऐसे सभी ‘भवन विहीन’ स्कूलों की जानकारी मांगी है। अधिकारियों को स्पष्ट कहा गया है कि वे स्कूलों की मान्यता की तिथि, वहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या और संचालित कक्षाओं का पूरा ब्यौरा तत्काल उपलब्ध कराएं। समय सीमा में लापरवाही को गंभीरता से लेने की चेतावनी भी दी गई है।
इस कार्रवाई के साथ ही सवाल उन अधिकारियों पर भी खड़ा हो गया है, जिन्होंने बिना भवन वाले स्कूलों को मान्यता दी। अब मांग उठ रही है कि जांच सिर्फ स्कूल संचालकों तक सीमित न रहे, बल्कि उन जिम्मेदार अफसरों की भूमिका भी तय की जाए, जिनकी मंजूरी से यह पूरा तंत्र खड़ा हुआ।
न्यायधानी बिलासपुर में पहले से विवादों में रहा नारायणा टेक्नोक्रेट स्कूल एक बार फिर चर्चा में है। यह स्कूल स्वयं के भवन के बजाय लीज पर लिए गए परिसर में संचालित हो रहा है, जहां 20 वर्षों के लिए सालाना 22 लाख रुपए का करार किया गया है। इस व्यवस्था को लेकर लगातार विवाद की स्थिति बनी रहती है और यह मामला अब व्यापक जांच के संदर्भ में फिर से केंद्र में आ गया है।
इसी मुद्दे को लेकर NSUI ने भी विरोध का अनोखा तरीका अपनाया। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के बाहर “लापता DEO” के पोस्टर चस्पा कर विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठाए गए। आरोप लगाए गए कि अधिकारी कार्यालय में उपलब्ध नहीं रहते और छात्रों से जुड़े मामलों पर समय पर कार्रवाई नहीं होती। यह विरोध अब शिक्षा विभाग की जवाबदेही पर सीधे सवाल खड़े कर रहा है।
हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद शुरू हुई यह कवायद अब प्रदेश के हजारों निजी स्कूलों के भविष्य पर असर डाल सकती है। जांच के दायरे में आने वाले कई स्कूलों की मान्यता रद्द होने की संभावना है। साथ ही यह कार्रवाई शिक्षा व्यवस्था में वर्षों से चल रही अनियमितताओं पर एक बड़ा प्रहार साबित हो सकती है।





