बिलासपुर…स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में नर्सरी कक्षाओं में प्रवेश बंद होने का मुद्दा अब कलेक्ट्रेट तक पहुंच गया है। गुरुवार को पूर्व विधायक शैलेष पाण्डेय दर्जनभर से अधिक अभिभावकों और छोटे बच्चों के साथ कलेक्ट्रेट पहुंचे और आत्मानंद स्कूलों में नर्सरी प्रवेश बंद करने के फैसले पर शासन-प्रशासन के खिलाफ जमकर आक्रोश जताया। अभिभावकों ने आरोप लगाया कि नर्सरी में प्रवेश नहीं मिलने और पहले से पढ़ रहे बच्चों के भविष्य को लेकर वे बेहद परेशान हैं। उनका कहना है कि निजी स्कूलों की भारी फीस वहन करना उनके लिए संभव नहीं है।

पूर्व विधायक शैलेष पाण्डेय ने आरोप लगाया कि बिलासपुर प्रदेश का ऐसा प्रमुख जिला बन गया है, जहां आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में नर्सरी के बच्चों को प्रवेश नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिन बच्चों ने प्रवेश की उम्मीद लगा रखी थी, उनके सामने अब निजी स्कूल में जाने की मजबूरी खड़ी हो गई है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह स्थिति किसी बड़े संकट से कम नहीं है।

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पाण्डेय ने कहा कि आत्मानंद स्कूलों की मूल परिकल्पना ही उन परिवारों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना थी, जो महंगी निजी शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते। पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में बिलासपुर में 32 से अधिक आत्मानंद स्कूल खोले गए थे, जहां हिंदी और अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा की व्यवस्था की गई। नर्सरी से लेकर 12वीं तक बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के उद्देश्य से शिक्षकों और सुविधाओं की व्यवस्था की गई थी।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बदलने के बाद आत्मानंद स्कूलों की व्यवस्था लगातार कमजोर की जा रही है। शिक्षकों की कमी, प्रवेश में बदलाव और अब नर्सरी स्तर पर प्रवेश रोकने की स्थिति ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। पाण्डेय ने सवाल उठाया कि यदि सरकार आत्मानंद स्कूलों को बंद नहीं कर रही है तो छोटे बच्चों के प्रवेश पर रोक और शिक्षकों की संख्या में कमी आखिर किस दिशा की ओर इशारा करती है?

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निजी स्कूलों की फीस गरीब कैसे भरेगा?

पाण्डेय ने कहा कि आत्मानंद स्कूलों ने निजी स्कूलों की मनमानी फीस से परेशान परिवारों को एक विकल्प दिया था। बड़ी संख्या में अभिभावकों ने अपने बच्चों को निजी स्कूलों से निकालकर आत्मानंद स्कूलों में दाखिला दिलाया था। ऐसे में सरकारी स्कूलों की व्यवस्था कमजोर होने से सबसे ज्यादा नुकसान उन परिवारों को होगा, जिनके पास निजी स्कूलों की भारी फीस भरने की क्षमता नहीं है।

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उन्होंने कहा कि सरकार को यह बताना चाहिए कि आखिर बिलासपुर में ही नर्सरी प्रवेश को लेकर ऐसी स्थिति क्यों बनी, जबकि अभिभावक अपने बच्चों के लिए सरकारी स्कूल में बेहतर और सस्ती शिक्षा चाहते हैं। उनका कहना था कि यदि एक स्कूल में बच्चों को प्रवेश देने के लिए सालाना अतिरिक्त खर्च भी आता है तो वह सरकार के कुल बजट की तुलना में बहुत बड़ी राशि नहीं है। बच्चों के भविष्य के सामने खर्च को मुद्दा बनाना उचित नहीं है।

दूसरे जिलों में व्यवस्था तो बिलासपुर में क्यों नहीं?

पूर्व विधायक ने दावा किया कि प्रदेश के दूसरे जिलों में आत्मानंद स्कूलों में नर्सरी स्तर की व्यवस्था अभी भी चल रही है। ऐसे में उन्होंने सरकार और जिला प्रशासन से सीधा सवाल किया कि अगर दूसरे जिलों में छोटे बच्चों को प्रवेश दिया जा सकता है तो बिलासपुर में यह व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती?

उन्होंने कहा कि बिलासपुर प्रदेश के प्रमुख शहरों में है और यहां दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग शिक्षा के लिए आते हैं। ऐसे शहर में गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा के विकल्प को सीमित करना अभिभावकों के हित में नहीं है।

शिक्षा मंत्री के बयान पर उठाया सवाल

शैलेष पाण्डेय ने प्रदेश के शिक्षा मंत्री के उस दावे पर भी सवाल उठाया, जिसमें विधानसभा में स्कूल बंद नहीं होने और बच्चों के प्रवेश में किसी तरह की बाधा नहीं होने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि एक तरफ सदन में कहा जा रहा है कि स्कूल बंद नहीं हुए और प्रवेश में कोई अड़चन नहीं है, दूसरी तरफ बिलासपुर में नर्सरी के बच्चों को प्रवेश नहीं मिल रहा। ऐसे में सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

उन्होंने कहा, “अगर स्कूल बंद नहीं हो रहा है तो नर्सरी में प्रवेश क्यों बंद है? अगर बच्चों को शिक्षा से वंचित नहीं किया जा रहा है तो इन अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए कलेक्ट्रेट तक क्यों आना पड़ रहा है?”

मांग पूरी नहीं हुई तो सड़क पर उतरने की चेतावनी

पूर्व विधायक ने बताया कि वे अभिभावकों और बच्चों की समस्या लेकर कलेक्टर से मिलने पहुंचे हैं। उन्होंने कहा कि अभिभावकों की मांग है कि आत्मानंद स्कूलों में नर्सरी के बच्चों को प्रवेश दिया जाए और बच्चों के भविष्य के साथ किसी तरह का समझौता न किया जाए।

पाण्डेय ने चेतावनी दी कि यदि बच्चों के प्रवेश और शिक्षा के अधिकार से जुड़े इस मुद्दे पर समाधान नहीं निकला तो वे अभिभावकों के साथ सड़क पर उतरकर आंदोलन करेंगे। उन्होंने कहा कि यह केवल कुछ बच्चों के प्रवेश का मामला नहीं है, बल्कि उन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों की शिक्षा का सवाल है, जो निजी स्कूलों की भारी फीस नहीं उठा सकते।

कलेक्ट्रेट पहुंचने वाले अभिभावकों ने भी प्रशासन से आत्मानंद स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट करने और बच्चों को शिक्षा से वंचित नहीं करने की मांग की। अब देखना होगा कि प्रशासन इस पूरे मामले में क्या निर्णय लेता है और नर्सरी प्रवेश को लेकर अभिभावकों की परेशानी का समाधान कैसे होता है।