बलरामपुर (पृथ्वी लाल केशरी)… बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई के दावों के बीच एक तीन वर्षीय मासूम की मौत का मामला सामने आया है। परिजनों का आरोप है कि बुखार से पीड़ित बच्चे को सारनाडीह में संचालित एक कथित अवैध क्लिनिक में ले जाया गया, जहां इंजेक्शन लगाने के बाद उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। बाद में जिला अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने बच्चे को मृत घोषित कर दिया। पुलिस ने मर्ग कायम कर मामले की जांच शुरू कर दी है।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल लगातार यह दावा करते रहे हैं कि बिना लाइसेंस और नियमों के विपरीत चिकित्सा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है। मंत्री ने यहां तक कहा है कि प्रदेश में कोई झोलाछाप डॉक्टर नहीं है। बलरामपुर जिले की यह घटना हालांकि इन दावों के जमीनी अमल पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

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जानकारी के अनुसार बलरामपुर थाना क्षेत्र के जमुआटांड निवासी रमेश चेरवा के तीन वर्षीय पुत्र को बुखार था। परिजन उसे इलाज के लिए सारनाडीह निवासी एक कथित झोलाछाप डॉक्टर के क्लिनिक लेकर पहुंचे। आरोप है कि वहां बच्चे को इंजेक्शन लगाया गया। इंजेक्शन लगने के बाद ही उसकी तबीयत बिगड़ने लगी। बच्चे की हालत गंभीर होती देख परिजन उसे घर ले गए, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। इसके बाद उसे अचेत अवस्था में जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

मासूम की मौत के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बिना वैध चिकित्सकीय योग्यता या अनुमति के इलाज करने वाले लोगों के खिलाफ स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है। जिले में समय-समय पर कथित झोलाछाप डॉक्टरों के क्लिनिक संचालित होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति होने के आरोप भी लगते रहे हैं। यही वजह है कि ग्रामीण इलाकों में लोग जानकारी के अभाव और नजदीक में इलाज मिलने की मजबूरी के चलते ऐसे कथित चिकित्सकों के पास पहुंचते हैं।

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बताया जा रहा है कि पिछले साल भी गलत इलाज के आरोपों के बीच एक मासूम की मौत का मामला सामने आया था। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में बिना वैध अनुमति चिकित्सा करने वालों के खिलाफ स्थायी और प्रभावी निगरानी व्यवस्था नजर नहीं आ रही है। स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी केवल कार्रवाई तक सीमित न रहकर ग्रामीणों को प्रशिक्षित चिकित्सकों से इलाज कराने के लिए जागरूक करने की भी है।

फिलहाल बच्चे की मौत के वास्तविक कारण का पता पुलिस जांच और आवश्यक चिकित्सकीय जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था और झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई के दावों को जरूर कठघरे में खड़ा कर दिया है। तीन साल के मासूम की मौत का यह मामला अब जांच के साथ-साथ प्रशासन की जवाबदेही का भी सवाल बन गया है।

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