बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अधिकारों की सीमा को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नज़ीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि पिछड़ा वर्ग आयोग को किसी निजी कारोबारी लेन-देन या आपसी विवाद में ‘सिविल कोर्ट’ की तरह फैसला सुनाने का अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि आयोग एक पक्ष पर देनदारी निर्धारित कर दूसरे पक्ष को भुगतान कराने का आदेश नहीं दे सकता, क्योंकि आयोग की शक्तियां मुख्य रूप से सलाहकारी और सिफारिशी प्रकृति की हैं।

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यह पूरा मामला कांकेर जिले के निवासी दुष्यंत प्रकाश नाग और दुर्ग स्थित कमला मोटर्स के बीच हार्वेस्टर मशीन की खरीदी से जुड़े विवाद से शुरू हुआ था।

दुष्यंत ने आरोप लगाया था कि उन्होंने 21 लाख रुपये का पूर्ण भुगतान करने के बावजूद डीलर ने उन्हें तय मॉडल की हार्वेस्टर मशीन उपलब्ध नहीं कराई। इस मामले की शिकायत जब छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग तक पहुँची, तो आयोग ने न केवल डीलर को दोषी माना, बल्कि मुआवजे की राशि वसूलकर पीड़ित को देने की सिफारिश भी कर दी। साथ ही, दुर्ग कलेक्टर को इस राशि की वसूली सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

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आयोग के इस फैसले को कमला मोटर्स के संचालक कैलाश बारमेचा ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

इससे पहले सिंगल बेंच ने आयोग के आदेश को रद्द कर दिया था, जिसके खिलाफ दुष्यंत नाग ने डिवीजन बेंच में अपील दायर की थी। अब डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील को खारिज कर दिया है।

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हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1995 का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी जांच के लिए आयोग को सिविल कोर्ट जैसी कुछ शक्तियां मिलना उसे पूर्णतः सिविल कोर्ट नहीं बना देता। ये शक्तियां केवल साक्ष्य जुटाने और जांच में सहायता के लिए होती हैं।

कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी आदेश की प्रकृति उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके प्रभाव से तय होती है। यदि आयोग किसी निजी व्यक्ति से पैसे वसूलने का निर्देश देता है, तो वह न्यायिक आदेश का रूप ले लेता है, जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का संदर्भ देते हुए डिवीजन बेंच ने यह स्पष्ट किया कि आयोग निजी पक्षों के वित्तीय अधिकारों या देनदारियों का फैसला उसी तरह नहीं कर सकता, जैसे एक दीवानी अदालत करती है। हाई कोर्ट के इस रुख ने यह साफ कर दिया है कि आयोग अपनी वैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर केवल सामाजिक और शैक्षणिक विषयों पर सिफारिशें दे सकता है, लेकिन वह निजी व्यापारिक विवादों में मध्यस्थ या वसूली एजेंट की भूमिका नहीं निभा सकता।