छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार के मंत्रिपरिषद विस्तार को लेकर कानूनी पेच फंसता नजर आ रहा है। बिलासपुर हाई कोर्ट ने राज्य के 14वें मंत्री की नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए समय दिया है।

यह मामला संविधान के अनुच्छेद 164(1क) के उल्लंघन से जुड़ा है, जिसमें मंत्रिपरिषद की सदस्य संख्या को लेकर स्पष्ट सीमाएं निर्धारित की गई हैं। अब 1 सितंबर 2026 को हुई ताजा सुनवाई के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी सरगर्मियां तेज हो गई हैं।

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पूरा विवाद छत्तीसगढ़ विधानसभा की सदस्य संख्या और मंत्रियों की संख्या के गणित पर टिका है। याचिकाकर्ता, कांग्रेस नेता और सामाजिक कार्यकर्ता वासुदेव चक्रवर्ती का दावा है कि 90 सदस्यीय विधानसभा वाले राज्य में मंत्रियों की संख्या कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।

संवैधानिक गणना के अनुसार, छत्तीसगढ़ के लिए यह संख्या अधिकतम 13.5 (यानी 13) होनी चाहिए। हालांकि, साय सरकार में तीन नए चेहरों के शपथ लेने के बाद मंत्रियों की कुल संख्या 14 हो गई है। इसी 14वें मंत्री की नियुक्ति को असंवैधानिक बताते हुए याचिका में सामान्य प्रशासन विभाग सहित मंत्रिपरिषद के सभी 14 सदस्यों को पक्षकार बनाया गया है।

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इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब पहले की सुनवाई में राज्य सरकार ने दलील दी थी कि इसी तरह का एक मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इसके चलते हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट होने तक अपनी कार्यवाही रोक दी थी। 18 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित याचिका को यह कहते हुए निराकृत कर दिया कि राज्य में चुनाव संपन्न होने के कारण वह मामला अब निरर्थक हो गया है। सुप्रीम कोर्ट से रास्ता साफ होते ही बिलासपुर हाई कोर्ट ने इस याचिका पर पुन: संज्ञान लिया है।

कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता किशोर भादुड़ी और अभ्युदय सिंह ने मजबूती से पक्ष रखा, वहीं राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण दास और शशांक ठाकुर उपस्थित हुए। इससे पहले, 29 अगस्त 2025 को कोर्ट ने याचिकाकर्ता की पात्रता और उनके सामाजिक कार्यों के रिकॉर्ड भी तलब किए थे, जिस पर वासुदेव चक्रवर्ती ने शपथपत्र के साथ साक्ष्य प्रस्तुत किए थे। अब हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को इस गंभीर संवैधानिक प्रश्न पर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

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राज्य के जवाब के बाद याचिकाकर्ता को अपना प्रतिउत्तर (रिज्वाइंडर) पेश करने का मौका मिलेगा, जिसके बाद अंतिम सुनवाई के लिए मामला सूचीबद्ध किया जाएगा।