रायपुर।छत्तीसगढ़ के पंचायत संवर्ग के शिक्षकों को क्रमोन्नति वेतनमान (टाइम-बाउंड पे स्केल) दिलाने की लंबी कानूनी लड़ाई में एक नया और महत्वपूर्ण मोड़ आया है. सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1998 और 2005 में नियुक्त शिक्षकों के साथ-साथ नगरीय निकाय (अर्बन लोकल बॉडी) में कार्यरत शिक्षकों से जुड़े प्रकरण पर सुनवाई करते हुए मामले को पुनः छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय को नए सिरे से सुनवाई हेतु प्रतिप्रेषित (रिमांड) कर दिया है.

इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं को यह राहत भी प्रदान की है कि यदि हाई कोर्ट के निर्णय के बाद आवश्यकता पड़ी, तो वे पुनः सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकते हैं.

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सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई.

इस निर्णय ने राज्य भर के उन हजारों पंचायत संवर्ग शिक्षकों के भीतर न्याय की एक नई उम्मीद जगा दी है, जो पिछले लंबे समय से अपने क्रमोन्नति वेतनमान की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं.

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इस महत्वपूर्ण मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुधांशु चौधरी और वरिष्ठ अधिवक्ता मनीषा टी. कारिया ने प्रभावी ढंग से पैरवी की.

उल्लेखनीय है कि इस पूरे प्रकरण में बिलासपुर के अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड देवाशीष तिवारी के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में कुल 7 याचिकाएं दाखिल की गई थीं.

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यह विधिक लड़ाई ‘छत्तीसगढ़ सहायक शिक्षक समग्र फेडरेशन’ के बैनर तले लड़ी जा रही है. फेडरेशन के प्रांताध्यक्ष रविंद्र राठौर के नेतृत्व में मनीष मिश्रा, बसंत कौशिक, शेषनाथ पांडेय, दिनेश नायक, दिनेश राठौर, सुरेश नेताम और रणजीत बनर्जी सहित अन्य प्रमुख पदाधिकारियों ने इस कानूनी प्रक्रिया में निरंतर सक्रिय भूमिका निभाई है.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हुए छत्तीसगढ़ सहायक शिक्षक समग्र फेडरेशन के पदाधिकारियों ने इसे शिक्षकों के हक और न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है.

फेडरेशन के प्रतिनिधियों ने विश्वास व्यक्त किया है कि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के समक्ष होने वाली नए सिरे की सुनवाई में शिक्षकों के पक्ष को पूरी मजबूती से रखा जाएगा।