हाईकोर्ट की सख्ती पड़ोस में, ‘बिरला फाउंडेशन’ पर सन्नाटा: मोपका से व्यापार विहार तक नियमों को खुली चुनौती..शिक्षा विभाग मौन
एक मान्यता, दो संचालन; 8 प्रतिशत सीमा टूटी, सीबीएसई बिना स्पष्ट दस्तावेज, जिला शिक्षा विभाग की चुप्पी

बिलासपुर..जहां नियम रुक जाते हैं, वहीं से यह कहानी शुरू होती है। एक ही इलाके में दो तस्वीरें दिखती हैं—ब्रिलिएंट और सेंट जेवियर पर हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद कार्रवाई, और उसी दायरे में बिरला फाउंडेशन/ओपन स्कूल का निर्बाध संचालन। सवाल यहीं से उठता है—जब कार्रवाई संभव है, तो यहां क्यों नहीं? यही विरोधाभास पूरे प्रकरण को साधारण शिकायत से उठाकर सीधे सिस्टम की निष्पक्षता के कटघरे में खड़ा करता है। स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि यह संस्थान प्रदेश के एक बड़े कोयला कारोबारी से जुड़ा है—और यही कारण है कि कार्रवाई की रफ्तार यहां थमी हुई नजर आती है।
मोपका: सीमित मान्यता, विस्तारित संचालन
मोपका स्थित बिरला फाउंडेशन इंटरनेशनल स्कूल को कक्षा 1 से 8 तक की मान्यता मिली बताई जाती है। इसके आगे की स्थिति स्पष्ट नहीं, लेकिन कक्षाओं का विस्तार 12वीं तक होने के आरोप हैं। सीबीएसई के नाम पर संचालन, जबकि अनिवार्य एनओसी और संबद्धता के दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं—यह अंतर ही सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा करता है।
कोयला कार्यालय में कक्षा 1 से 4 तक स्कूल
दीनदयाल उपाध्याय गार्डन के सामने, महावीर कोयला कार्यालय के भवन में कक्षा 1 से 4 तक की कक्षाएं संचालित हो रही हैं। इस परिसर की अलग से मान्यता का स्पष्ट रिकॉर्ड सामने नहीं आता, लेकिन ‘इंटरनेशनल’ नाम के साथ संचालन जारी है। स्थानीय स्तर पर यह भी सामने है कि यहां के छात्रों के सर्टिफिकेट मोपका से जुड़े दिखाए जाते हैं—यानी पढ़ाई एक जगह, प्रमाणन दूसरी जगह।
गार्डन को मैदान बताने का दावा, कागज नहीं
व्यापार विहार स्थित बिरला ओपन इंटरनेशनल स्कूल प्रबंधन पास के दीनदयाल उपाध्याय गार्डन को अपना खेल मैदान बताता है। लेकिन अनुमति पत्र की मांग पर दस्तावेज सामने नहीं आते। इसके बावजूद खेल शुल्क वसूला जा रहा है—जबकि जमीन पर सुविधा स्पष्ट नहीं।
फीस: शासन का आदेश बेअसर
हाल ही में शासन ने स्पष्ट किया—फीस वृद्धि 8% से अधिक नहीं होगी। इसके बावजूद 10 से 14% तक बढ़ोतरी के आरोप सामने हैं। फीस नियमन समिति की बैठक नहीं, हर साल एडमिशन फीस और अतिरिक्त शुल्क—यह पैटर्न नियमों से अलग चलता दिखता है।
किताबों का दबाव: सरकारी व्यवस्था से दूरी
छत्तीसगढ़ शासन की किताबों का उठाव नहीं किया जा रहा। इसके स्थान पर निजी प्रकाशनों और स्कूल चेन के कोर्स को अनिवार्य किया गया है। नतीजा—छोटे बच्चों के बैग में जरूरत से ज्यादा किताबें, पढ़ाई का संतुलन प्रभावित।
ट्रस्ट और संचालन: अनुमति बनाम हकीकत
जिस ट्रस्ट के तहत संचालन बताया जाता है, उसके मूल उद्देश्य और जमीन पर चल रही गतिविधियों में अंतर दिखाई देता है। यह अंतर नियामकीय प्रक्रिया और निगरानी की प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है।
शिक्षा विभाग की भूमिका: सबसे बड़ा प्रश्न
इतने स्तर पर सवालों के बावजूद जिला शिक्षा विभाग की ओर से ठोस कार्रवाई का अभाव नजर आता है।
यही वजह है कि पूरे मामले में कार्रवाई का पैमाना अलग-अलग दिख रहा है—जहां कुछ संस्थानों पर तुरंत सख्ती, वहीं इस नेटवर्क पर लंबी चुप्पी।
तथ्य और आगे की दिशा
व्यापार विहार स्थित बिरला फाउंडेशन इंटरनेशनल स्कूल की अलग से मान्यता नहीं है—यह बात स्थानीय स्तर पर स्वीकार की जाती है। इसके बावजूद संचालन जारी है और शैक्षणिक दस्तावेज मोपका से जुड़े बताए जाते हैं।
मोपका स्थित स्कूल में भी कई स्तर पर अनियमितताओं के संकेत हैं—इस पर विस्तृत रिपोर्ट अगली कड़ी में।
सवाल सिर्फ एक स्कूल का नहीं
मोपका से व्यापार विहार तक फैला यह पूरा ढांचा अब सिर्फ एक संस्थान का मामला नहीं रह गया। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है, जो नियम बनाती है—लेकिन क्या उन्हें लागू भी कर पाती है? बहरहाल इस तरह बिना स्पष्ट मान्यता और नियमों के विपरीत संचालन जारी रहा, तो यह सीधे शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रहार होगा।





