रायपुर। छत्तीसगढ़ इस समय एक साथ तीन मोर्चों पर हड़ताल की चपेट में है। राज्य के जूनियर डॉक्टर, स्वामी आत्मानंद स्कूलों के संविदा शिक्षक और पटवारी — तीनों अपनी-अपनी मांगों को लेकर एक साथ सड़कों पर उतर आए हैं। मानसून के इस संवेदनशील मौसम में, जब मौसमी बीमारियों का प्रकोप सबसे ज़्यादा होता है, स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर ग्रामीण स्तर पर राजस्व और स्कूली शिक्षा व्यवस्था तक — पूरा प्रशासनिक ढांचा प्रभावित हो रहा है।

डॉक्टरों का ‘वन स्टाइपेंड, वन नेशन’ आंदोलन

छत्तीसगढ़ के करीब एक हज़ार इंटर्न डॉक्टर इस वक्त अनिश्चितकालीन और चरणबद्ध हड़ताल पर हैं। इन डॉक्टरों का कहना है कि वे अस्पतालों में 24 से 36 घंटे तक की कठिन ड्यूटी निभाते हैं, लेकिन बदले में मिलने वाला मानदेय बेहद कम है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ में इंटर्न डॉक्टरों को 15,900 रुपए प्रति माह स्टाइपेंड मिलता है, जिसे पूर्व की हड़तालों के दबाव में 12,000 रुपए से बढ़ाया गया था। डॉक्टरों के मुताबिक पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में यह राशि 40,000 रुपए तक है, जबकि बिहार और झारखंड में यह 25,000 से 30,000 रुपए के बीच है। इसी बड़े अंतर को लेकर जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन “वन स्टाइपेंड, वन नेशन” यानी पूरे देश में एक समान स्टाइपेंड की मांग कर रहा है।

स्टाइपेंड बढ़ोतरी के अलावा डॉक्टर बॉन्ड संबंधी समस्याओं के समाधान और एमसीएच कैडर की स्थापना की मांग भी उठाई जा रही है। जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. पीयूष श्रीवास्तव के अनुसार, वे पिछले करीब डेढ़ साल से लगातार मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिख रहे हैं, और मेकाहारा अस्पताल में मुख्यमंत्री को 17-सूत्रीय ज्ञापन भी सौंपा जा चुका है, लेकिन अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है।

इस हड़ताल का असर सीधे मरीजों की देखभाल पर पड़ रहा है, क्योंकि अस्पतालों में मरीजों की रोज़मर्रा की देखभाल का बड़ा हिस्सा यही इंटर्न डॉक्टर संभालते हैं। मानसून के इस दौर में, जब बस्तर और जगदलपुर जैसे इलाकों में मलेरिया का प्रकोप फैला हुआ है और हॉस्टलों में बच्चों की मौत की खबरें भी सामने आ रही हैं, डॉक्टरों की अनुपस्थिति ने स्वास्थ्य संकट को और गहरा कर दिया है।

स्वामी आत्मानंद स्कूलों के शिक्षकों का हल्लाबोल

साल 2020 में शुरू हुई स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल योजना को छत्तीसगढ़ में लगभग छह साल पूरे होने जा रहे हैं। इन स्कूलों के संविदा शिक्षक और कर्मचारी संघ, जिसके अध्यक्ष दुर्योधन यादव हैं, रायपुर के तूता धरना स्थल पर दो दिवसीय सांकेतिक प्रदर्शन किया। शिक्षकों का कहना है कि उनके पढ़ाए बच्चे लगातार प्रदेश की टॉप-10 मेरिट सूची में जगह बना रहे हैं, बावजूद इसके उनकी बुनियादी मांगों की लगातार अनदेखी हो रही है। पिछले पांच वर्षों से लगातार ज्ञापन सौंपे जाने के बावजूद अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है।

शिक्षकों की पांच प्रमुख मांगें हैं — पहली, उन्हें कलेक्टरों की अध्यक्षता वाली समितियों से हटाकर सीधे शिक्षा विभाग से जोड़ा जाए। दूसरी, मध्य प्रदेश की तर्ज पर संविदा कर्मचारियों को हर साल 3 से 5 प्रतिशत वेतन वृद्धि और “समान कार्य, समान वेतन” का लाभ मिले, क्योंकि छत्तीसगढ़ में बीते छह वर्षों से संविदा वेतन में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। तीसरी, ड्यूटी के दौरान दुर्घटना या मृत्यु होने पर परिवार के लिए 50 लाख रुपए के सुरक्षा बीमा की व्यवस्था हो। चौथी, पीएफ कटौती की सुविधा दी जाए। और पांचवीं, मध्य प्रदेश के संविदा नियमों को छत्तीसगढ़ में भी लागू किया जाए। शिक्षकों ने चेतावनी दी है कि अगर 15 अगस्त तक उनकी मांगों पर विचार नहीं हुआ, तो वे आने वाले दिनों में सात दिवसीय या अनिश्चितकालीन आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

पटवारियों की वेतन विसंगति और पदोन्नति की जंग

राजस्व विभाग की महत्वपूर्ण कड़ी माने जाने वाले पटवारी भी पूरे प्रदेश में कामबंद हड़ताल पर बैठे हैं। उनकी मुख्य शिकायत यह है कि वे जिस पद पर नौकरी में आते हैं, अमूमन उसी पद से सेवानिवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि पदोन्नति के अवसर बेहद सीमित हैं। पटवारियों की मांग है कि विभागीय परीक्षा और वरिष्ठता के आधार पर — यानी 50 प्रतिशत वरिष्ठता और 50 प्रतिशत विभागीय परीक्षा के फॉर्मूले से — उन्हें राजस्व निरीक्षक के पद पर पदोन्नत किया जाए। इसके साथ ही वे अपनी वेतन विसंगतियों को भी दूर करने की मांग कर रहे हैं।

भाजपा  के मुताबिक विभाग की ओर से इस पर एक प्रस्ताव तैयार किया गया है, जिसके तहत 75 प्रतिशत राजस्व निरीक्षक पद पदोन्नति से भरे जाएंगे — इसमें 70 प्रतिशत पटवारियों से और 5 प्रतिशत ट्रेसर से पदोन्नति होगी। इस प्रस्ताव पर जल्द अंतिम निर्णय लिए जाने की उम्मीद जताई जा रही है।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज़

कर्मचारियों के इस व्यापक असंतोष ने राज्य की सियासत को भी गरमा दिया है। कांग्रेस  का आरोप है कि सत्ता में आने से पहले भाजपा ने कर्मचारियों से बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन अब सुशासन का ढोल पीटा जा रहा है जबकि ज़मीन पर सिर्फ खोखली घोषणाएं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा आत्मानंद स्कूलों को बंद करने की योजना बना रही है, और स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों की कमी के चलते बस्तर में मलेरिया से बच्चों की जान जा रही है। कांग्रेस का यह भी कहना है कि मंत्रियों, सांसदों और कलेक्टरों के बीच तालमेल की भारी कमी है, जिससे प्रशासनिक अव्यवस्था जैसे हालात पैदा हो गए हैं।

वहीं भाजपा  का कहना है कि सरकार जल्दबाज़ी में कोई ऐसा फैसला नहीं लेना चाहती, जिससे आगे चलकर कानूनी अड़चनें खड़ी हों — इसलिए वह स्थायी और टिकाऊ समाधान की दिशा में काम कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी निर्णय वित्तीय प्रावधानों और प्रशासनिक नियमों को ध्यान में रखकर ही लिया जा सकता है। भाजपा ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए सवाल उठाया कि जब पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने इन शिक्षकों की नियुक्ति संविदा आधार पर की थी, तब उनके लिए कोई स्थायी नीति क्यों नहीं बनाई गई थी।

संवाद ही एकमात्र रास्ता

आंदोलनकारी डॉक्टरों और शिक्षकों का कहना है कि हड़ताल शुरू होने के बाद से अब तक न तो सरकार का कोई प्रतिनिधि और न ही प्रशासन का कोई अधिकारी उनसे सीधे बातचीत करने पहुंचा है। ऐसे में इस गतिरोध को तोड़ने का एकमात्र रास्ता संवाद ही नज़र आता है। मानसून के इस संवेदनशील मौसम में, जब स्वास्थ्य, शिक्षा और राजस्व — तीनों ज़रूरी सेवाएं प्रभावित हैं, आम जनता को होने वाली परेशानी को देखते हुए सरकार पर आंदोलनकारियों से सीधी बातचीत शुरू करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है।