बलरामपुर। (पृथ्वी लाल केशरी)…एक गर्भवती महिला प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। परिजन उसे ढांढस बंधा रहे थे। सामने सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र था, लेकिन उसके मुख्य दरवाजे पर ताला लटका हुआ था। परिसर में स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए बने सरकारी आवास भी बंद थे। आखिरकार अस्पताल के दरवाजे खुलने से पहले ही महतारी एक्सप्रेस में महिला का प्रसव कराना पड़ा। यह दृश्य किसी दुर्गम इलाके में स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंचने की कहानी नहीं, बल्कि संचालित सरकारी अस्पताल के सामने बेबस मां और उसके परिजनों की तस्वीर है।

बलरामपुर जिले के राजपुर विकासखंड के ग्राम रेवतपुर स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की यह घटना स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। दशहरे के दिन मंगलवार को सामने आए इस घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहा है। वीडियो में अस्पताल के मुख्य गेट पर ताला और सामने खड़ी महतारी एक्सप्रेस में प्रसव पीड़ा से जूझती महिला दिखाई दे रही है। जिस स्वास्थ्य केंद्र से आपात स्थिति में तत्काल उपचार मिलने की उम्मीद थी, वहां उस समय कोई चिकित्सक या स्वास्थ्य कर्मचारी मौजूद नहीं था।

जानकारी के मुताबिक, मंगलवार को अंबिकापुर की ओर से गुजर रहे कुछ राहगीरों ने रेवतपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के सामने महतारी एक्सप्रेस खड़ी देखी। वाहन के भीतर गर्भवती महिला प्रसव पीड़ा से कराह रही थी। परिजन अस्पताल खुलने की उम्मीद में इंतजार कर रहे थे, लेकिन मुख्य द्वार पर ताला लटका था। परिसर में कर्मचारियों के सरकारी आवासों पर भी ताले नजर आए। पूरे परिसर में सन्नाटा पसरा था।

महिला की हालत ऐसी थी कि उसे दूसरे अस्पताल ले जाने का इंतजार करना भी मुश्किल हो रहा था। आखिरकार महतारी एक्सप्रेस में ही प्रसव कराना पड़ा। एक ओर महिला जिंदगी के सबसे नाजुक क्षण से गुजर रही थी, दूसरी ओर सरकारी अस्पताल का दरवाजा बंद रहा। यह केवल एक महिला की परेशानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की जवाबदेही का सवाल है, जिसके भरोसे ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं और नवजातों की सुरक्षा छोड़ी गई है।

घटना की जानकारी मिलने पर गांव के पंचायत प्रतिनिधि मौके पर पहुंचे। उन्होंने फोन पर चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मचारियों को सूचना दी। बताया गया कि घटनाक्रम शुरू होने के करीब एक घंटे बाद अंबिकापुर से एक महिला स्वास्थ्य कर्मचारी वहां पहुंची। इसके बाद अस्पताल का ताला खोला गया और प्रसूता तथा नवजात को भीतर ले जाकर प्राथमिक उपचार दिया गया।

3 चिकित्सक और 17 कर्मचारी, अस्पताल बंद क्यों?

रेवतपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मुख्य मार्ग के किनारे स्थित है। यहां एक एमबीबीएस चिकित्सक सहित कुल तीन चिकित्सक और 17 कर्मचारियों का अमला पदस्थ बताया गया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने बड़े स्टाफ की तैनाती के बावजूद प्रसव जैसी आपात स्थिति में अस्पताल में कोई जिम्मेदार कर्मचारी क्यों नहीं मिला? क्या ड्यूटी रोस्टर की व्यवस्था नहीं थी, क्या निर्धारित समय पर उपस्थिति की जांच नहीं हुई या आपातकालीन सेवाओं की निगरानी में गंभीर चूक हुई?

इन सवालों का जवाब स्वास्थ्य विभाग को देना होगा। केवल घटना के बाद अस्पताल का ताला खुल जाना पर्याप्त नहीं है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उस समय किसकी ड्यूटी थी, कर्मचारी कहां थे और गर्भवती महिला को समय पर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी थी।

कलेक्टर और CHMO की निगरानी पर सवाल

जिले में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और कर्मचारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना प्रशासन तथा स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है। ऐसे में रेवतपुर की घटना ने कलेक्टर और मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी की निगरानी व्यवस्था को भी सवालों के घेरे में ला दिया है। जब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तीन चिकित्सक और 17 कर्मचारी पदस्थ हैं, तब अस्पताल में ताला लटकने जैसी स्थिति कैसे बनी? क्या मैदानी स्तर पर अस्पतालों की नियमित जांच हो रही है? अगर हो रही है, तो ऐसी गंभीर चूक पकड़ में क्यों नहीं आई?

फिलहाल वायरल वीडियो और सामने आए घटनाक्रम के आधार पर संबंधित अधिकारियों की भूमिका तथा कर्मचारियों की अनुपस्थिति के कारणों की जांच जरूरी है। प्रशासन को ड्यूटी रजिस्टर, उपस्थिति विवरण और उस दिन की आपातकालीन व्यवस्था की जांच कर तथ्य सार्वजनिक करने चाहिए। संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही जिम्मेदारी तय हो सकेगी।

सवाल सिर्फ एक ताले का नहीं, भरोसे का है

ग्रामीण परिवार सरकारी अस्पताल इसलिए पहुंचते हैं कि आपात स्थिति में उन्हें समय पर उपचार मिल सके। प्रसव जैसी स्थिति में हर मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसे में अस्पताल के सामने खड़ी महतारी एक्सप्रेस में महिला का प्रसव होना और उसके बाद स्वास्थ्य कर्मचारी का पहुंचना व्यवस्था की ऐसी तस्वीर पेश करता है, जिसे सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

रेवतपुर की घटना ने एक सीधा सवाल खड़ा किया है—जब अस्पताल में चिकित्सक और कर्मचारियों की पूरी व्यवस्था होने का दावा है, तो संकट की घड़ी में मरीज के लिए दरवाजा बंद क्यों था? अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस मामले में वास्तविक जिम्मेदारी तय करते हैं या यह घटना भी सोशल मीडिया पर कुछ दिनों की चर्चा बनकर रह जाती है।