छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में सरकारी परियोजना के लिए पहले ही अधिग्रहित की जा चुकी जमीन की कई साल बाद निजी व्यक्ति के नाम रजिस्ट्री होने का मामला सामने आया है।

जल संसाधन विभाग ने वर्ष 1982 में ग्राम सुंदरपुर की जमीन का अधिग्रहण कर संबंधित भू-स्वामियों को मुआवजा भी दे दिया था। इसके बावजूद वर्ष 2011 में उसी जमीन का एक हिस्सा उर्वशी सिंह ने पंकज अग्रवाल को बेच दिया।

खरीदार ने राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने के साथ जमीन पर खेती और चारदीवारी भी कर ली। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया कि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद की गई रजिस्ट्री से खरीदार को जमीन पर मालिकाना हक नहीं मिल सकता।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए खरीदार को विक्रेता के खिलाफ धोखाधड़ी के आरोप में दीवानी और आपराधिक कार्रवाई करने की छूट दी है।

कोर्ट के फैसले के मुताबिक, पहले से अधिग्रहित जमीन को बाद में खरीदने से सरकारी अधिग्रहण का प्रभाव समाप्त नहीं होता।

क्या है पूरा मामला? मामला ग्राम सुंदरपुर के खसरा नंबर 336/1 की जमीन से जुड़ा है। पंकज अग्रवाल ने 29 अप्रैल 2011 को उर्वशी सिंह से 62 हजार रुपये में 0.121 हेक्टेयर जमीन खरीदी थी। बाद में जमीन का खसरा नंबर बदलकर 336/3 हो गया। खरीदार ने अपने नाम पर राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण कराया और जमीन पर खेती करने के साथ चारदीवारी भी बना ली।

दरअसल, जल संसाधन विभाग ने इस क्षेत्र की जमीन का अधिग्रहण वर्ष 1982 में किया था। अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद संबंधित भू-स्वामियों को मुआवजा भी बांट दिया गया था। विभाग ने लंबे समय तक जमीन पर प्रत्यक्ष कब्जा नहीं किया। इसी बीच अधिग्रहित जमीन की निजी स्तर पर बिक्री और रजिस्ट्री हो गई।

परियोजना शुरू करने के दौरान खुला मामला—-विभाग जब सुंदरपुर में अपनी परियोजना शुरू करने के लिए जमीन पर कब्जा लेने पहुंचा, तब पता चला कि अधिग्रहित जमीन के हिस्से पर खेती की जा रही है और चारदीवारी भी बना दी गई है।

इसके बाद जल संसाधन विभाग के एसडीओ ने 19 फरवरी 2021 को कब्जाधारी को नोटिस जारी किया। नोटिस में 0.453 हेक्टेयर जमीन 15 दिनों के भीतर खाली करने के लिए कहा गया। विभाग ने स्पष्ट किया कि जमीन का अधिग्रहण 7 जून 1982 को किया जा चुका है और उर्वशी सिंह सहित संबंधित भू-स्वामियों को मुआवजा भी दिया गया था।

इस नोटिस को पंकज अग्रवाल ने चुनौती दी। उनका कहना था कि उन्होंने जमीन की विधिवत रजिस्ट्री कराई है और राजस्व रिकॉर्ड में भी उनका नाम दर्ज है। ऐसे में उन्हें अतिक्रमणकारी नहीं माना जा सकता।

राज्य सरकार ने कोर्ट में क्या कहा?

राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट में बताया गया कि संबंधित जमीन का अधिग्रहण वर्ष 1982 में पूरा हो चुका था और मुआवजे का भुगतान भी किया जा चुका था। सरकार ने दलील दी कि पूर्व भू-स्वामी ने अधिग्रहित जमीन को बेचकर खरीदार के साथ धोखाधड़ी की है।

इसलिए वर्ष 2011 में हुई रजिस्ट्री के आधार पर खरीदार अधिग्रहित जमीन पर मालिकाना अधिकार का दावा नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?

जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि जमीन के अधिग्रहण की अधिसूचना 25 नवंबर 1980 को जारी हुई थी, जबकि पंकज अग्रवाल ने इसे 29 अप्रैल 2011 को खरीदा। यानी जमीन का अधिग्रहण खरीदी और रजिस्ट्री से कई साल पहले हो चुका था।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली विकास प्राधिकरण बनाम दामिनी वाधवा मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जमीन खरीदने वाला व्यक्ति बाद का खरीदार होता है। ऐसी स्थिति में रजिस्ट्री से उसे अधिग्रहित जमीन पर मालिकाना हक प्राप्त नहीं होता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना या जमीन पर चारदीवारी बना लेना भी अधिग्रहण के बाद खरीदार को स्वामित्व का अधिकार नहीं देता। हालांकि, यदि विक्रेता ने पहले से अधिग्रहित जमीन बेचकर धोखाधड़ी की है, तो खरीदार उसके खिलाफ दीवानी और आपराधिक कार्रवाई कर सकता है। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पंकज अग्रवाल की याचिका खारिज कर दी।